23.सिर्फ मां होती है

 सिर्फ माँ होती है

शिशु को अपने खून से सींचकर

पीड़ाओं को अपनी मुट्ठी में भींचकर

औरत बच्चे को जन्म देती है...

अब वह सिर्फ माँ होती है...


अब उसके समय का चक्र

शिशु के मुताबिक घूमता है...

थकन के बाद भी उसका 

 मन खुशी से झूमता है...


आठों पहर बच्चे पर माँ की

नजरों का पहरा होता है...

यदि वह रोए तो माँ को

दुख गहरा होता है...


लोरियाँ गाते, थपकियाँ देते

माँ की नींद पूरी होती नहीं...

बच्चे की फिक्र में माँ 

रात भर सोती नहीं...


अपनी तो माँ को परवाह नहीं

बच्चा हीं उसकी जान होता है...

उसकी किलकारियाँ हीं

माँ का गुमान होता है...


बच्चे के पहले कदम से 

माँ अपने आखिरी कदम मिलाती है...

बिना स्वार्थ बिन लालच के

माँ हरदम साथ निभाती है...


तुम्हें सोचूँ तो हिमालय से निकली हुई  पवित्र गंगा सी दिखती हो माँ!

जो अपने संग मेरा हर दुख-दर्द बहा ले जाती हो...


 

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