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वो नया इंसान

 "वो नया इंसान" अब मेरा लिखना, सिर्फ लिखना नहीं रहा— मेरी हर पंक्ति एक नया गीत है... वो मेरी कविता की स्याही में  घुल गया है, और मैंने अपने गीतों की  नाज़ुक पँखुरियों पर  उसका नाम लिख दिया है... हाँ, वो नया इंसान! जीवन के संघर्ष की आँच में तपा कंचन है वह— सपनों सा कोमल और सच की तरह कठोर है ... उससे हर मुलाकात, मेरे अकेलेपन की गर्त में  उतरकर जमा हुआ जहर  निकाल फेंकती है मुझमें से। उसकी आहट मुझे  मेरे और करीब ले आती है, हर बार पहले से ज़्यादा... अब मेरी तनहाइयाँ  अवसाद से नहीं रोतीं, वे मुस्कुराने लगी हैं। उसकी नजदीकी... मेरे हृदय की अंधेरी दीवारों पर झीना-सा प्रकाश बनकर  फैल जाती है। मेरी धड़कनों की गहराइयों में हम दोनों की साँसों का संगीत बजता है... वो नया इंसान— सिर्फ “कोई” नहीं, बल्कि मेरी कविता की आत्मा है। उसका स्नेह धीरे-धीरे सूखती  मेरी धमनियों की दरारों को  भिगोता है, जैसे कोई अदृश्य हाथ मेरी मरती रूह को  थपकियाँ देकर जिला रहा हो... मैंने उसे जितना महसूस किया है, उतने में हीं जीवन भर  लिख सकती हूँ उसे , जीवन भर गा ...
 बातों बातों हीं में अपना कह बैठी हूँ देखो ना  कुछ तो नाता तुमसे मेरा गहरा होगा देखो ना  कहते  हैं कुछ रिश्ते होते पूर्व जन्म के मान  भी लो  तभी पथिक इस राह चला तो ठहरा होगा देखो ना 
 अपनी परछाई से दूरी लगती है दुनिया अनचीन्ही अनजानी  लगती है छोड़ो दुनिया की बात करेगा क्या  कोई हर रिश्ते की बखिया उधड़ी सी लगती है दिल निचोड़ कर अपना रेगिस्तान किया अब आँखो की बगिया सूखी लगती है जहर पचाना होता खेल नहीं लेकिन  जहरीले की फितरत डसना लगती है  चल रही हवा माकूल शहर की थी लेकिन किसी की नादानी से आँधी आई लगती है व्हतुर सयाने कुछ  होते कोयल जैसे चालाकों को चोट कहाँ कब लगती हैं पलक पांँवड़े बिस्तर दो पालो पोसो  सुनो पथिक!  करुणा मूरख की  लगती है अपनी परछाई से दूरी लगती है। जीना भी जैसे मजबूरी लगती है।। छोड़ो दुनिया किसकी बात करोगे अब, हर रिश्ते की साँस अधूरी लगती है।। दिन कोई भी लगता कहाँ सुनहरा सा, शाम कहाँ कोई सिन्दूरी लगती है।। कभी गुलाबी तबियत थी जिन सपनों की, उनकी  रंगत  भूरी  भूरी  लगती  है ।। "पथिक"भूख को सड़ी गली बासी रोटी, मिले  कहीं  तो  छोले  पूरी  लगती है।
भारत का अभिमान तिरंगा, लहर-लहर लहराने दो। नवयुग को इक नई प्रभाती  नूतन स्वर में गाने दो। झंडा लहरा-लहरा कर जब,छूता है अंबर का माथा।  दिशा-दिशा गुंजित करता है, गाकर वह वीरों की गाथा।   अमर शहीदों की कुर्बानी, व्यर्थ नहीं तुम जाने दो। भारत का अभिमान तिरंगा,  लहर-लहर लहराने दो। पथ के शोलों से, अंगारों से,चट्टानों से नहीं डरे। आजादी की सौगंध लिए,सीने पर खाकर चोट मरे। है पराधीनता तम गहरा,स्वर्णिम किरणें सज जाने दो।  भारत का अभिमान तिरंगा,लहर लहर-लहराने दो।   जागो भारत के नौनिहाल,अब वक्त नहीं है सोने का। अक्षुण्ण एकता बनी रहे,लो प्रण कण-कण संजोने का।  बंदूकों के तोपों के युग का, अब युगांत हो जाने दो। भारत का अभिमान तिरंगा, लहर-लहर लहराने दो।   फूलों से कलियों से घर-घर,  बंदनवार सजाने दो। भारत का अभिमान तिरंगा,  लहर-लहर लहराने दो।   नवयुग को एक नई प्रभाती,  नूतन स्वर में गाने दो। भारत का अभिमान तिरंगा,  लहर-लहर लहराने दो।

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 आया कार्तिक मास सुहाना  फिर क्यों दिल घबराए रे  हवा हुई गद्दार नवंबर  हाए  बीता जाए रे  धरती का तो हाल बुरा है  अंबर देखो मौन है  सूरज आने से कतराता  बोलो दोषी कौन है  आग लगाकर खुद ही भइया  पीछे क्यों पछताय रे  हवा हुई गद्दार नवंबर  हाय बीता जाए रे  पीपल जैसी छाँव भूल कर  खूब सजाए गए नगर  और फेफड़ों में भर–भर कर  पीते रहते लोग जहर  काँटा बोए खंजर पाले  घायल अब निरुपाय रे  हवा हुई गद्दार नवंबर  हाय बीता जाए रे  आया कार्तिक मास सुहाना  फिर क्यों दिल घबराए रे  हवा हुई गद्दार नवंबर हाय बीता जाए रे सुखद सुहानी सर्द हवा संग  मन यह दौड़ लगाता  किंतु उसी पल साँस फूलती  कहीं सुकून न आता  पल पल ताजी स्वच्छ हवा को  सबका दिल ललचाये रे । हवा हुई गद्दार नवंबर  हाय बीता जाए रे
विषय:- ऋतुराज विधा:- छंद आवाज मुझे तुम देते हो, कोई जादू सा छा जाता है... चाहे कोई भी मौसम हो, ऋतुराज पास मुस्काता है... कि सर्द धूप में आ जाती है  तपिश तुम्हारी बोली से... ठूँठ में जैसे नव-पल्लव हो  आस पनप सा जाता है... फिर से खुशबू घुल जाती है ठहरी हुई हवाओं में... प्रेम भरे अनुरागी मन का राग छलक सा जाता है... आ जाते हैं फिर से वो दिन वही  रूप श्रृंगार लिए... मान लिए मनुहार लिए वो प्यारे दिन लौट आते है... छेड़ रही हो मुझको जैसे कोयलिया की तान लगे... पास हो तुम तो मेरे मन का तार खनकता जाता है... "पथिक रचना"