जनता जाग रही है
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"जनता जाग रही है"
-प्रभाती
गणतंत्र जिन्हें प्यारा है,
वैसे लोगों को
पूछना चाहिए नेता से-
क्या नेताओं का कर्म
देश में भ्रटाचार बढ़ाना है?
क्या नेताओं का धर्म
देश की ज्वाला को उकसाना है?
जनता जिसको चुन लेती है,
उसको रहनुमा समझती है।
आखिर ये नेता कैसे हैं,
जो दिशाहीन जनजीवन की
राहों को रोका करते हैं?
ये लोकतंत्र की छाया में
असली अधिनायकवादी हैं।
करते जब कभी प्रलाप
मंच के ऊपर से,
तब अवसरवादी शिष्यों की
जयघोष सुनाई पड़ती है।
जनता जब कभी दिखाती है
काला झंडा,
तब इसके सीने पर अंधी
गोलियाँ चलाई जातीं हैं।
ये शांतिपूर्ण हड़तालों को,
घेराव, जुलूस, सभाओं को,
सत्याग्रह को...
अथवा भूखों की मांगों को
पागलपन की संज्ञा देकर
सत्ता का बोझ उठाते हैं।
हल्ला- गुल्ला, नारेबाजी,
हड़ताल, प्रदर्शन, तोड़-फोड़,
ये सारी बातें ऐसी हैं,
जो इनको बहुत अखरती हैं।
गौतम, गाँधी के पूजक हैं,
इनको अशान्ति से नफरत है।
दिल्ली में श्वेत कपोतों को,
इसलिए उड़ाते आए हैं।
मरने के पहले लिखते हैं
वसीयतनामा-
मैं मर जाऊँ तो राख छींट देना मेरी
भारत के सारे खेतों में,
भारत की सारी नदियों में,
गंगा यमुना के संगम पर।
विश्वास उन्हें है! ऐसे भी,
थोड़ी उर्वरता आएगी।
नदियाँ खेतों को जल देंगी,
धरती फसलें उपजाएगी।
इस चिता भस्म से देवों की
पृथ्वी पवित्र हो जाएगी।
अवतारोंवाली धरती का
इतिहास नया बन जाएगा।
संसार इसे भी गाएगा।
हम जला रहे हैं जोत
जवाहर प्यारे की,
देखें भारत के कण-कण में
दीवाली कब तक आती है?
जो 'नेहरू की जय' कहते हैं,
जय उनकी कौन मनाता है?
जिनको तलाश प्यारी है,
वैसे लोगों को...
पूछना चाहिए राजा से-
उसकी सवारियों के नीचे
क्यों जनता कुचली जाती है?
क्यों दिल्ली के सिंहासन से
लोहू की बदबू आती है?
यह कौन राज है! गाँधी के
सपनों पर किसको चलना था?
चुप वो भी हैं जो अपने को
सर्वोदयवादी कहते हैं।
पूछो समाज के रहबर से
क्यों चुप्पी साधे बैठे हैं,
क्यों जनता लूटी जाती है?
जिनको विकास प्यारा है,
वैसे लोगों को
पूछना चाहिए शासन से-
जब जनता जगने लगती है,
तब दिल्ली क्यों डर जाती है?
जब आग सुलगने लगती है,
सरकारी दफ्तर जगते हैं।
जब कोई चीख मचाता है,
विद्रोही बोला जाता है।
सच कहनेवाली जनता को,
इज्मों में बाँधा जाता है।
हर चलनेवाला राही
किस आशंका से घबराता है?
जिसको जनता प्यारी है,
उसके नायक को-
चाहिए पूछना सत्ता से,
इस अँधेरे की उम्र
भला अब कितनी है?
जनतंत्र भला क्या होता है?
जनता की आहें कितनी है,
यह सत्ता कितना सुनती है?
जिनको तलाश प्यारी है,
उनके खोजी को
चाहिए मशाल उठा लेना!
हम ढूँढेंगे किस कोने में
भूखी मानवता रोती है,
प्यासा इंसान तड़पता है।
हम ढूँढेंगे उन लोगों को,
जिनमें ईमान सुरक्षित है।
हम ढूँढेंगे उत्तर
अपने उन प्रश्नों का,
छाती के भीतर सुलग-सुलग
जो हमें जलाया करते हैं।
संबोधित करना है हमको
उन लोगों को-
पाते जो बोल नहीं लेकिन,
हम अलग-थलग चलने वाले
हर टूटे हुए मुसाफिर से,
वे सदा इशारे में मन की
बातें समझाया करते हैं।
अब शेष हो रहा समय,
व्यक्ति के शोषण का।
तूफान जागरण का सुन लो!
हहराता है।
हर ओर मुक्ति की ज्वाल
दिखाई देती है,
कवि खड़ा किरण के गीत
मस्त हो गाता है।
-जनता जाग रही है-
जनतंत्रवाद की जनता इतना याद रखे-
नेतृत्व बदलने का अवसर
केवल चुनाव में आता है।
यह मौसम है, जिस मौसम में
नेता की खेती होती है,
सारे भारत की मिट्टी पर,
मत पत्र गिराए जाते हैं,
लीडर की गणना होती है।
यह मौसम है, जिस मौसम में
आता चुनाव अभियान
रंग के उत्सव सा।
मिल जाते हैं उम्मीदवार,
एम0 एल0 ए0 अथवा
एम0 पी0 के,
सड़कों, मेडो़ं, पगडंडी पर,
गलियाँ, कूचे, दोराहे पर,
चौपाल, चौक, चौराहे पर।
वे सपनों में भी रह-रहकर
'पब्लिक-पब्लिक' चिल्लाते हैं ।
वोटर-वोटर से मिलने की
इच्छा होती है लीडर में,
हर दरवाजे पर जा-जाकर
ये लोग दस्तकें देते हैं,
उल्टा-सीधा बतलाते हैं।
ज्योंहीं चुनाव आता त्योंहीं-
कुछ पार्टी दफ्तर खुलते हैं,
कुछ पोस्टर साटे जाते हैं,
कुछ झूठों के घोषणापत्र
जनता में बाँटे जाते हैं ।
कुछ आम सभायें होती हैं,
कुछ झंडे नए निकलते हैं,
कुछ डंडे नए निकलते हैं,
कुछ पंडे नए निकलते हैं,
कुछ लोग खरीदे जाते हैं,
वादों पर वादे होते हैं,
भाषण पर भाषण होता है।
जनता के नकली सेवक को
असली गुलाब के फूलों की
माला पहनाई जाती है-
चंदोबे ताने जाते हैं,
जयकार मनाई जाती है।
जब नेता ऊपर चढ़ता है,
जनता तालियाँ बजाती है।
जब जनता ऊँघा करती है,
नेता चिल्लाने लगते हैं।
होता विरोध में जब हल्ला,
तब मंच छोड़कर रक्षा की
योजना बनाने लगते हैं।
पीछे से ऊपर आए थे,
पीछे से भागा करते हैं ।
फिर भी ये बाज नहीं आते,
अपने पिछले हथकंडों से ।
डरते आए हैं स्वागत में,
केलों के छिलके,
सड़े टमाटर,अंडों से ।
ये नेता वोटर लोगों को
पार्टी का चिन्ह बताते हैं।
जनता की सेवा करने को
कसमों पर कसमें खाते हैं।
चेले इनके सिखलाते हैं-
मोहर देना मतपत्रों पर
मतदाता भाई-बहनों को।
कुछ नेता ऐसे आते हैं-
यज्ञोपवीत दिखलाते हैं।
बेचा करते हैं नाम!
जाति का जी भरकर
कुल, गोत्र बताया करते हैं,
गुरु मंत्र सिखाया करते हैं।
हरिजन के पूर्ण समर्थन में
केंद्रीय मिनिस्टर आते हैं,
जो जातिवाद फैलाते हैं।
ये जाति-धर्म के नेता है!
अथवा वोटों के क्रेता हैं...
या जनमत के विक्रेता हैं?
टोपियाँ तुरंत रख देते हैं,
लीडर जनता के पाँवों पर।
घड़ियाली आँसू-आँखों में!
ओठों पर राम कहानी है-
इस बार एलेक्शन में भैया!
टोपी की लाज बचानी है
दो वोट नहीं, बस कफन मुझे,
अथवा कर ही दो दफन मुझे,
फिर नहीं दुबारा आऊँगा।
अगले चुनाव के पहले हीं
लगता है मैं मर जाऊँगा।
वह सबसे ऊँचा नेता है,
जो तगड़ा भाषण देता है।
जो बात-बात पर गाँधी का
संदेश सुनाया करता है,
उपदेश बताया करता है।
बाँधा करता पुल सदा
प्रशंसा का अपनी,
दूसरे दलों से इसे
शिकायत रहती है।
बस, इसे छोड़कर और लोग
अविचारी, भ्रष्टाचारी हैं।
जो जितना बड़ा विवादी है,
वह उतना गाँधीवादी है।
नेता का असली मतलब
वह बहरुपिया हो-
जो बात-बात पर लंबी साँसे लेता हो
जो मिनट-मिनट पर
रंग बदलनेवाला हो।
जो झूठे वादे करता हो,
भाषण देने से अवसर पर जो रोता हो,
भोजन करने पर बारह घंटे सोता हो।
जो कहे 'जिगर के टुकडे़'
सारे युवकों को!
हर युवती जिसकी बहना हो,
हर औरत जिसकी मैया हो,
हर एक नागरिक भैया हो।
जो अनावरण तो करे
बुद्ध की प्रतिमा का,
उद्घाटन 'गाँधी आश्रम' का,
लेकिन मुर्गे के बिना न कौर उठाता हो।
भाषण देने के पहले सत्य-अहिंसा पर!
थोड़ा सा गोश्त कबूतर का,
दर्जन भर अंडे खाता हो।
जो जूते, रोडे़, गाली का अभ्यासी हो,
बंगलो में रास रचाता हो,
पर, मंचों पर सन्यासी हो।
वह लीडर जो कुछ कहने के
पहले,अल्कोहल लेता हो,
वातानुकूलित कक्षों में
डनलप के ऊपर सोता हो।
वह नेता है, जिस नेता को-
नीचे चलने के लिए कार,
ऊपर उड़ने के लिए यान की सुविधा हो।
लीडर-लीडर की धूम मची है गली-गली,
हर नकली लीडर, खादी की
असली पोशाक पहनता है।
जितना ही नीचे मैला है,
उतना ही ऊपर बनता है।
जितने ही बगुला भगत मिलेंगे खादी के,
उनमें ज्यादातर दुश्मन हैं आजादी के!
ये 'सत्यमेव जयते' का बिल्ला लगा-लगा,
बोला करते हैं झूठ भरे चौराहे पर।
वर्षों से चर्चा करते हैं-
बेकारी दूर भगाने की,
आर्थिक समानता लाने की,
सबको अधिकार दिलाने की।
दुश्मनी गरीबी से इनकी पुश्तैनी है,
बस, रही दोस्ती इन्हें अमीरी से केवल!
मतलब के यार बड़े पक्के,
रखवाले हैं आजादी के।
मजबूत करेंगे यही हाथ
दिल्ली वाली शहजादी के।
मौका चुनाव का मिलते ही,
दिल्ली भारत के गाँवों में
आशीष मांगने आती है।
यह दिल्ली अपने नैहर में
आकर कितना शर्माती है!
शहजादी है-
इससे आँचल में वोट भरो!
यह दूब, धान, हल्दी से
कभी न खुश होगी-
जब दूब सूखने लगती है,
हाथों की हल्दी उड़ जाती
सूखा, अकाल
अस्तित्व निगलने लगता है
जब जनता का,
यह दिल्ली देश-विदेशों में
तब हाथ पसारा करती है,
यह लाज हमारी जनता की
बेहिचक उघारा करती है।
भूखे, नंगे, बेकारों की
यह शक्ति स्वरुपा रानी है,
दुर्गा, लक्ष्मी,भवानी है।
मारन, मोहन, उच्चाटन की
यह देवी है।
भोजन,भाषण, उद्घाटन की
यह देवी है।
दिल्लीवाले सिंहासन की यह देवी है।
यह दिल्ली की, दिल्ली इसकी।
जन की आँखों में जगी हुई
मृगतृष्णा सी,
यह सब को नाच नचाती है,
यह सब को पाठ पढ़ाती है,
यह भूल-भूलैया है कोई,
जो सबको खेल दिखाती है।
नारा है इसका रामराज,
पर, राम खड़ा धनखेतों में
भूखा-प्यासा चिल्लाता है
यह समाजवाद-
जो मेहनतकश जनता का
बोझ बढ़ाता है।
सामंतवाद का कुहरा तो
होता जाता है और सघन।
ढोंगी, पाखंडी, पद-लोलुप
नारों पर नारे देते हैं,
असली चेहरे का मिलना तो,
अब बहुत असंभव लगता है
जितने हीं चेहरे मिलते हैं,
उतने हीं लगे मुखौटे हैं।
यह दिल्ली है- यह दिल्ली है...
फूलों की नगरी में बैठी,
काँटो का किस्सा सुनती है
यह दिल्ली है, जो जनता के
आँसू में मोती चुनती है।
कुछ ऐसे लोग खड़े होते
अक्सर इन आम चुनावों में,
जिनको बैठाने की खातिर
थैलियाँ चढ़ाई जाती हैं।
थैली लेकर छपवाते हैं
ये पर्चा एक समर्थन का,
जो थैली इन्हें चढ़ाता है,
उनके हित में चिल्लाते हैं।
जो भी लड़ता है यह चुनाव-
पक्का व्यवसाई होता है,
थैली वालों की जीत यहाँ पर निश्चित है।
जिसकी लाठी में जोर हुआ,
वह भैंस खोल ले जाता है।
जंगल वाला कानून
अभी तक चलता है।
इंसाफ चाहने वालों को,
कायर की संज्ञा दी जाती।
ईमान चाहने वालों को,
ठोकर पर ठोकर मिलती है।
यह जातिवाद का रोग बड़ा संक्रामक है- भाई-भाई के बीच कलह फैलाता है।
पैदा करता है संप्रदाय इंसानों में,
हिंसा का कितना भद्दा खेल रचाता है?
कुछ लोग जाति का नाम
बेचकर लड़ते हैं,
कुछ लोग धर्म को राजनीति
की आड़ बनाए बैठे हैं।
भाषा को भाई-भाई की
दीवार बनाए बैठे हैं।
ये प्रांतवाद का जहर उगलते जनता में,
जो भी हथकंडा काम करे,
उसको प्रयोग में लाते हैं।
हर हिंदू से कहते हैं "गैया मैया है"
हर मुस्लिम से कहते "तू मेरा भैया" है
ये झगड़ा पैदा करते हैं,
भारत में हरिजन ब्राम्हण का।
बस! इन्हें जरूरत है तो केवल वोटों से,
जो सदा खरीदे जाते हैं
पूंजीपतियों के नोटों से।
ये ऊँच-नीच के बीच भेद
हर रोज बढ़ाया करते हैं
बटमार, मुनाफाखोरों से
इनकी हमदर्दी रहती है।
अगले चुनाव के पहले ये
गूलर के फूल बने रहते,
जनता हो जाती गौण तभी
जब जीत इन्हें मिल जाती है।
सरकार नहीं यह जनता की,
जो भी है-एक छलावा है,
धोखा है मात्र भुलावा है।
यह दिल्ली है, जो करती है,
शासन भारत की जनता पर,
पहले कर लेती हाथ
देश के जनमत को,
फिर नए करों का बोझ
लाद देती सिर पर।
यह बजट बनाती है
जनता के शोषण का।
अपने करती है राज!
मौज से गद्दी पर।
शहरों में खून हुआ करता शहजादों का,
सेना बनती है रोज नक्सली लोगों की,
आती है भय से नींद न पूंजीपतियों को।
बेकारी, भूख सताती है जिन लोगों को,
वे चुपके-चुपके रातों में
ईमान बेचते फिरते हैं,
भगवान बेचते फिरते हैं।
अपने ही घर में रहकर हम,
लगता जैसे विस्थापित हों।
यह दिल्ली है- यह दिल्ली है,
हर एक नागरिक के ऊपर
भाषण का जादू करती है।
जनता का दुखड़ा सुनने पर,
ठंढी आहें भी भरती है।
यह मंत्र-मुक्त कर देती
अपने भाषण से,
राशन की भूखी जनता को।
आवाज़ बड़ी हीं मीठी है-
जो भी हो,
आखिर रानी है!
जनता अकाल के लिए
व्यर्थ चिल्लाती है-
दिल्ली में कोई कमी नहीं अंगूरों की!
यह सेब,अनारों की नगरी,
फैशनवालों की दुनिया है।
मस्ती बिकती है यहाँ
बोतलों में ढ़लकर!
यह रूप, जवानी पर अपनी
हर मौसम में नितराती है।
जनता जीती है पेट काटकर किसी तरह,
दिल्ली दिलवालों की नगरी कहलाती है।
नेताओं का यह शहर,
जहाँ झोपड़ियों से आनेवाले
मंत्री, महलों में रहते हैं।
माँ को मिल पाती नहीं खेसारी की रोटी,
भाई को मिलता नहीं, यहाँ जौ का दाना,
हर बाप पुआलों के घर में
अपना अस्तित्व बचाता है।
निर्धनता मिली विरासत में,
इन लोगों को आजादी की!
वे खाक चैन से सोएँगे,
जिनकी कन्याएँ क्वारी हैं?
दिन-रात जिन्हें अपनी इज्जत
का प्रश्न जलाया करता है?
वधुओं के नथ का सोना
बिकता कौड़ी में,
दिल्ली फूलों के हारों पर
कई लाख निछावर करती है।
चम्मच से खाना खाती है,
बोतल का पानी पीती है,
शाही बंगले में जीती है।
यह नगरी नाजुक लोगों की-
कामुकता इनकी हॉबी है,
भावुकता इनका जीवन है।
ये सदाचार के पोस्टर
साटा करते हैं दीवारों पर,
खिड़की-दरवाजों के भीतर
खुद नंगे नाचा करते हैं!
भीतर का इनका रंग
बड़ा चटकीला है,
बाहर जनता में आने पर,
गाँधीवादी आदर्शों की
ये पोथी बाँचा करते है।
इनकी रातों का रंग,
गुलाबी होता है।
इनके जीने का ढंग
शराबी होता है।
ये राजनीति के मकड़जाल
हर ओर बनाए फिरते हैं,
चुपचाप बैठ जाते फिर इसके कोने में,
जनता तो भोली-भाली है।
खुद हीं इसमें फँस जाती है।
स्वाधीन देश की जनता है,
क्या हुआ कि यह लँगड़ाती है?
पायल की रुनझुन सुननेवाले कानों को,
आवाज़ दूसरी कभी नहीं छू पाती है।
ये जनगण के अधिनायक हैं,
ये भाग्य विधाता भारत के!
पथ भूली जनता इनकी हीं
जयकार मनाया करती है।
जनता सराहती इन्हें कर्मयोगी कहकर,
ये ऐसे गाँधीवादी हैं,
जो गाँधी-दर्शन पुस्तक में,
नंगी तस्वीरें रखते हैं।
चाँँदी के ग्लासों में मदिरा
ये मंचों पर भी चखते हैं।
ये झूठ बोलने में होते हैं अति प्रवीण,
सच से है इनको बड़ी घृणा,
ये पैसों पर ईमान बेचते हैं अपना।
सरकार बनानी होती है,
या मंत्री बनना होता है-
केंचुल उतार अपने तन का,
दल-बदलू ये हो जाते हैं।
जिस दल से होकर आए थे,
उसको दलदल बतलाते हैं।
कुछ ऐसे भी है नेता, जो
"लिख लोढा़" हैं- "पढ़ पत्थर" हैं,
हो नहीं सका है,
जिनको अब तक दिशा ज्ञान,
हस्ताक्षर करने के पहले,
मुँह पोंछा करते तीन बार।
आ गई समस्या अगर कहीं,
बस! तुरत पसीना आता है।
है ज्ञात नहीं इनको असेंबली क्या होती?
मालूम नहीं है मंत्री का कर्तव्य इन्हें!
ये नहीं जानते मंत्री के
अधिकारों की क्या सीमा है?
मंत्री का सीधा अर्थ समझ में
'राजा' इनको आता है!
वह राजा- जो "परजा" का शासक होता है,
हर हाकिम जिसके अंदर है,
जो घूस-पैरवी जातिवाद का पोषक है।
वह नेता है, जो शोषक है!
शोषन है उसका यंत्र और
शासन ही उसका तंत्र
मगर,चिल्लाने को जनतंत्र
रात-दिन पब्लिक में चिल्लाता है।
पब्लिक को झुंड समझता है,
हर नेता भेड़-बकरियों का,
गुस्से में आकर जिस पर वह
लाठी, गोली चलवाता है।
इससे भी काम न चलता तो,
कुछ शोर मचाने वालों को,
जेलों में भेजा जाता है।
वारंट निकाले जाते हैं,
कर्फ्यू का नाटक होता है।
अधिकार मांगने वालों की,
जब भीड़ कहीं जुट जाती है,
सत्ता से ऊबे लोगों का,
आक्रोश अगर बढ़ जाता है,
मंचो पर, मोटर कारों पर,
पथराव अगर हो जाता है,
जूते, चप्पल की वर्षा जब,
होती है आम सभाओं में!
यह पुलिस बुला लेते अथवा
बुलवाकर फौजी लोगों को,
आदेश दमन का देते हैं,
फिटकिरी लगाया करते हैं,
ये खुद भी अपने अंगों की,
चोटों से नीली चमड़ी पर,
केवल ठुमरी हीं कानों में,
गुदगुदी लगाया करती है।
उर्वशी चाँदनी रातों में,
इनको बहलाया करती है।
'जय हिंद' दुलारा नारा है,
भारत के भाग्य विधाता का!
यह सिद्ध मंत्र है मंचों का।
जब भूखी जनता करती है,
उच्चारण इसका धीमे से,
तब इन्हें प्रजाओं पर अपनी,
सचमुच का गुस्सा आता है।
राजा हैं, अपनी जनता को
ये प्रजा समझते आए हैं।
राजा के आगे चुप रहना,
यह धर्म प्रजा का होता है।
चाहिए प्रजा को जुल्मों की,
चोटों को चुपके सह लेना,
भूखे-नंगे भी रह लेना।
है वही प्रजा,जो राजा की
हर दिन जयकार मनाती है,
राजा को फूल चढ़ाती है,
वह गीत उसी के गाती है।
राजा ही सब कुछ होता है,
बस! इतनी बात बताने को-
संपूर्ण देश के शहरों में,
कुछ मंच बनाए जाते हैं।
कुछ भोजन-भाषण होता है,
उद्घाटन भी हो जाता है,
कविताएँ गाई जाती हैं,
फिल्में दिखलाई जाती हैं,
रेकर्ड बजाए जाते हैं।
शीशे के सुंदर फ्रेमों में
अभिनंदन पत्र मढ़े जाते
धर्माअवतार की संज्ञा से
दुर्योधन फूला जाता है!
दु;शासन पकड़े चीर द्रौपदी के तन का,
मंचों के ध्वनि-विस्तारक पर चिल्लाता है।
यह शासन है दुःशासन का,
हर ओर विषमता छाई है।
टीले जितने ही ऊँचे हैं,
नीचे उतनी हीं खाई है।
कुछ लोग जिया करते हैं
ऊँचे महलों में
कुछ लोग मरा करते
टूटी झोपड़ियों में।
आती है दया किसे ऐसे
निर्धन, बेठौर अनाथों पर-
जाड़े की ठंडी रातों में,
जो मर जाते फुटपाथों पर?
पूंजीपतियों ने नहीं सुनी,
आवाज श्रमिक के रोने की।
दिन रात लगाया करते हैं,
ये कीमत चाँदी-सोने की।
फिर रक्त चूस मजदूरों का
होलियाँ मनाया करते हैं!
हर पूंजीवादी व्यक्ति
देश का प्रश्नचिन्ह-
जो पाप छिपाने को नृशंस हत्याओं का-
मंदिर बनवाया करता है कुछ नगरों में,
खुलवाता हैअपने नामों पर विद्यालय,
लूटा करता है यश बनवाकर गोशाला,
निर्माण करता सदा धर्मशालाओं का!
यह राजनीति को खेल समझता चंदे का,
नेता का सौदा कर लेना,
पूंजीपतियों का धंधा है,
सरकार बन्द रहती है इनकी मुट्ठी में।
भारत है देश किसानों का,
सारी दुनिया यह कहती है।
सच पूछो तो इसके किसान
भूखे,सूखे,अधनंगे हैं।
इस हरित क्रांति के युग में भी
हरियाली बेची जाती है-
जिसको खरीदते हैं लाला गठरीवाले
गोदाम भरा करते हैं मोटे सेठों के।
मुस्कान खरीदा करते हैं दौलतवाले-
वे जिनको चाँदी-सोना है,
दिलवालों के हिस्से में केवल रोना है।
ज्वाला सी जलती हुई भरी दुपहरिया में,
जो गेंहूँ, धान उगाते हैं चट्टानों पर-
उनको मिलती है नहीं रोटियाँ खाने को
लेकिन! अनाज सड़ जाते हैं गोदामों में,
सूखा, अकाल आ जाने पर
फिर!बिकते ऊँचे दामों में।
वे हीँ खरीदकर खाते हैं,
जो मरकर नाज उगाते हैं।
कोई कहता है- 'जय जवान'
कोई कहता है-'जय किसान'
कोई 'जय जगत' सुनाता है!
तात्पर्य मगर इन नारों का
कुछ नहीं समझ में आता है।
सब बातें फीकी लगती हैं
सर्वोदय की, ग्रामोदय की,
बस! पूँजी के उदयाचल पर
कुछ सूरज उगते जाते हैं।
पाँचों अंगुलियाँ कभी बराबर हुई नहीं,
एकांत खोजकर, धीमे से
नेता हमको बतलाते हैं।
हाथी के दोनों दाँतों का
अब अर्थ समझ में आया है।
यह भी है कोई राज भला,
क्या यह भी कोई सत्ता है?
ताज्जुब होता है, ऐसे में
चुप सोई कैसे जनता है?
आज़ाद देश के लोगों की,
किस्मत में लिखी गुलामी है।
चुपचाप सितम जो सहते हैं
उनमें हीं कोई खामी है!
आखिर कबतक नकली नेता,
नकली योजना बनाएँगे?
ऋण रोज विदेशों का लेकर
कितने त्योहार मनाएंगे?
महँगाई के इस मौसम में,
ऐसा भी तो हो सकता है!
हँसने मुस्काने पर भी ये
कल कोई टैक्स लगाएंगे!
यह प्रजातंत्र की जनता तो
भाषण से कभी न मानेगी,
चाहिए इसे असली समता,
सच्चा सुख, पक्का सर्वोदय!
चाहिए इसे अधिकार!
देश में रहने, जीने, खाने का।
चाहिए इसे आह्लाद, बैठकर
गीत मुक्ति के गाने का।
कल्पना बड़ी हीं सुंदर है,
धरती को स्वर्ग बनाने की-
जिन सपनों का आधार न हो,
वह सपना केवल सपना है।
आकारहीन कल्पना सदा
मृगतृष्णा बनती आई है!
वह लोकतंत्र मिथ्या जिसमें,
शोषण हो, भूख तबाही हो!
पर्दे में छिपकर झाँक रही,
जनता को तानाशाही हो।
नैतिकता जिनमें नहीं रही,
उनपर क्या करें भरोसा हम?
आचार बदलता नहीं अगर,
सरकार बदल कर क्या होगा?
बेसुरी रही झंकार अगर,
फिर तार बदल कर क्या होगा?
भूले-भटके गुमराहों को
नेता की संज्ञा मिलती है,
बस! इसीलिए तो शासन की
गद्दी, जब चाहे हिलती है।
जनमत की मची दुहाई है
पर जनता लूटी जाती है।
अधिकारी राज चलाते हैं,
भूखी जनता चिल्लाती है।
कर्तव्य बदलता नही अगर,
अधिकार बदल कर क्या होगा?
पीढ़ी-दर पीढ़ी मांग रही,
जीने को रोजी- रोटी दो,
रहने को राम मड़ैया भर
तन ढ़कने को लँगोटी दो।
नकली नेता के कानों को,
आवाज़ नहीं छू पाती है।
आजादी धोखेबाजों के
हथकंडों में पछताती है।
जब सारे माँझी पागल हों,
पतवार बदल कर क्या होगा?
जो जातिवाद के पोषक हो,
वह क्या निर्माण जगाएगा?
भ्रष्टाचारी शासक कैसे,
जनपथ मजबूत बनाएगा?
जो खुद प्यासा हो, प्यासों की
वह कैसे प्यास बुझाएगा?
करुणा हीं जिसमें नही भला!
क्या गीत मनुज के गाएगा?
उद्धार व्यक्ति को नहीं मिले,
उद्गार बदल कर क्या होगा?
नेतृत्व बदलने के पहले
मन बदले, बहुत जरूरी है!
देखना यही है- जनता से
नेता की कितनी दूरी है?
जनतंत्र मंच की चीज़ नहीं,
इसको जन-जन तक लाना है।
मंत्री बनने से अच्छा तो
जन में जागृति जगाना है।
आधार बदलता नहीं अगर,
तब द्वार बदल कर क्या होगा?
जब किसी देश में नहीं मिले
रोजी-रोटी इंसानों को,
आवाज़ सुनाई नहीं पड़े
शासन के बहरे कानों को,
जब जोर-जुल्म का राज़ कहीं
सीमा से आगे बढ़ता है-
जनशक्ति जगाया करती है तब,
पथरीली चट्टानों को!
मानवता करवट लेती है
ज्योतित दिनमान निकलता है
पौ फटने के पहले लेकिन,
पूजा का दीपक जलता है।
नेतृत्व जिन्हें खलता हो
वैसे लोगों को,
चाहिए पूछना नेता से-
वादे चुनाव के कहाँ गए?
घोषणा पत्र जो निकले थे,
पिछले कुछ आम चुनावों में,
उनकी सच्चाई कहाँ गई?
यह शंका अक्सर होती है,
हमको अपने नेताओं से-
ये नेता हैं अथवा कोई अभिनेता हैं!
जितने ढंगों से नाचेंगे अब के नेता,
उतना तो राजकपूर न खेल दिखाएगा।
सर्कस या जादूवाला भी
चेला इनका हो जाएगा।
उस दिन जनता थी
कहाँ नजर में नेता की,
गोलियाँ चली जिसदिन!
विद्या के आँगन में?
माँ के आँचल पर
लाल खून के धब्बे थे,
दुलहन की मांगों का
सिंदूर बिलखता था।
जब इसे सुनेगा भगत सिंह,
तब क्या होगा?
गाँधी, सुभाष की मिट्टी किस पर थूकेगी?
नेहरू का लाल गुलाब कहाँ मुस्काएगा?
अंँधेरे में जीनेवाली,
जनतंत्र देश की जनता को,
यह राजतंत्र की क्रूर सर्पिणी डस लेगी!
इसके फण पर भी चोट करेगा वक्त कभी,
अथवा कोई जीवटवाला,
फण पर बाँसुरी बजाएगा?
अभिमन्यू घिरा जो कहीं,
व्यूह के घेरे में,
अन्याय जानकर अर्जुन दौड़ा आएगा।
सारथी कौन होगा? यह समय बताएगा!
गुरु द्रोण, भीष्म की भूलों को
सह नही सकेंगे सजग लोग,
अब नई फसल के दूत
बहुत उफनाए हैं।
ये जला रहे नक्कालों की खादी टोपी,
झूठा रहबर चौराहे पर लँगड़ाता है।
ललकार रही है पीढ़ी नए जवानों को,
गाँधी समाधि में पड़ा हुआ अकुलाता है।
नर-नारी के मन का सोया
आक्रोश,उभरता जाता है।
सामने खड़ा नंगा यथार्थ,
कैसे कोई झुठलाएगा?
ज्वालामुखियों पर खड़ा मनुज,
कल गीत सृजन के गाएगा।
अणु से भी ज्यादा ताकत है,
मनु की जाग्रत सन्तानों में!
यह जीवन नया उगा देती,
कंकर-पत्थर,चट्टानों में!
यह राजतंत्र क्या लदा रहेगा जनता पर?
क्या जनता अपने कंधों पर
चट्टान उगाए दौड़ेगी?
यह हाँफेगी, तो इसे
चाहिए गंगा का पावन पानी,
जब आग लगी हो गंगा में,
यह कैसे प्यास बुझाएगी?
चेतना मनुज के प्राणों की,
लपटों पर कैसे गाएगी?
सम्बन्ध न जन का अंधी नौकरशाही से,
यह ऊब गई है बिल्कुल अफसरशाही से,
जो भ्रष्टाचारी शासक हैं,
उनको सहना अब मुश्किल है।
छलिया लोगों का, नेता के
पद पर रहना अब मुश्किल है।
कालेधन का सौदा जो मंत्री करते हैं,
जनता मशाल में लाकर
उन्हें चिढा़ती है।
कहती हैं उनको चोर!भरे चौराहे पर।
उनकी प्रशस्तियाँ गाने को,
कुछ जुलूस निकाले जाते हैं,
उनकी काली करतूतों का,
हर लेखा-जोखा होता है।
जिन अखबारों ने छापा था-
नेता कहकर!
उन्हीं अखबारों के द्वारा,
वे चोर बनाए जाते हैं।
पहले तस्वीरें छपती हैं,
फिर शोर मचाया जाता है।
हल्ला-हंगामा होता है,
आयोग बिठाए जाते हैं।
फिर जप्ती-कुर्की होती है,
या छापामारी होती है।
कुछ लॉकर खोले जाते हैं,
एकाउँट निकाला जाता है।
मूंगफली बेचनेवाली भावी पीढ़ी को, नेताओं के काले मुँह पर,
छिलके हीं छिलके मिलते हैं।
जनता कैसे विश्वास कर नेताओं पर,
जब राजनीति के पंडे भ्रष्टाचारी हो?
स्वेच्छाचारी,अविचारी, घूस-पुजारी हों?
जड़ में ही रोग लगा हो तो,
क्या तुक! फुनगी पर रोने में?
अस्तित्व ढूँढती है जनता,
कुहरे के कोने-कोने में।
युवकों की भावी पीढ़ी को,
भाषण कब तक बहलायेंगे?
कब तक कोरे आश्वासन से,
इनको फुसलाया जाएगा?
कब तक रोएंगे रोना यह बेकारी का? कितनी अर्जियां लिखेंगे अफसरशाही को?
छानेंगे कितनी खाक शहर की गलियों में?
चाहिए निराशा इन्हें और कितनी आखिर?
ढ़ोना है कब तक बोझ इन्हें लाचारी का?
जब सुलग उठेगा युवा वर्ग,
उस दिन का नक्शा क्या होगा?
बाँधेगा कौन भला धारा तरुणाई की? बांधा किस ने अब तक सागर के ज्वारों को?
रोका किसने युग की उठती ललकारों को?
जब तरुण शक्ति जगने लगती,
भूगोल सहमने लगता है।
तानाशाहों के गानों को
हुंकार सुनाई देता है।
लिखता अंतिम अध्याय
वक्त, अंधेरे का।
भूमिका लिखी जाती
नवीन उजियारे की।
यह देश हमारा है जिसके,
तरुणों को कोई काम नहीं।
गुमराह बने हैं नौजवान,
भूखी, बेहोश जवानी है।
हरदम कहता है वक्त,
जगा कर युवकों को
कब तक जीनी है,
तुम्हें जिंदगी नगरों की?
इस अंधे-बहरे शासन को,
गूंगो की नहीं जरूरत है।
आवाज उठानी है तुमको,
बोलना तुम्हें है इंकलाब!
शोषण, दोहन, उत्पीड़न का,
यह जंगल तुम्हें जलाना है।
जन-जन को न्याय दिलाने का,
अब बीड़ा तुम्हें उठाना है।
दिग्भ्रमित युवा पीढ़ी के लोगों! उठो बढ़ो,
ताकत है तेरे सीने में चट्टानों की,
क्षमता है तेरी बाँहों में तूफानों की,
तेरे पाँवों पर राजमुकुट शर्माता है,
तू ही भारत का असली भाग्य विधाता है!
तुम बढ़ो तरुण!
तुमको इतिहास बुलाता है।
पतझड़ की डाली से मधुमास बुलाता है! हर दिशा तुम्हारी ओर दृष्टि अटकाए है,
अब देश ढूँढता है तुम में अपना भविष्य! समवेत स्वरों में सधा हुआ
हुँकार करो।
ओ कालजयी! तुम जनता का,
पीड़ाओं से उद्धार करो!
तू जाति,धर्म से परे
देश का नया खून,
तू प्रांतवाद से अलग
मुल्क की नई उमर,
तू उठे अगर तो भाषा की दीवार हिले,
सारे भारतवालों का तुमको प्यार मिले उत्तर, दक्षिण का भेद कराते हैं नेता
तू बढ़े अगर तो दिशा-दिशा में द्वार मिले!
अब चलो बनाएँ नई डगर,
अब चलो बसाएँ नया नगर,
हर नौजवान को देता है,
नवयुग आमंत्रण चलने का।
दे रहा चुनौती वक्त,इसे
आगे बढ़ कर स्वीकार करो।
अलमस्त बनो, अंगारों के
इस पथ को अंगीकार करो!
निर्माण जगाकर गाएँगे,
हम गीत खेत-खलिहानों का।
हौसला बढ़ाना है हमको,
सीमा पर खड़े जवानों का!
है कसम यही आजादी की,
हम नई फसल के गीत लिखें
अब नया जागरण लाना है-
धरती को स्वर्ग बनाना है!
हम नहीं लिखेंगे नवयुग के
नारे, ढ़हती दीवारों पर।
जन-जन के मन में लिखना है,
हम सबको मिलकर मुक्ति गीत।
पढ़ना है हमको मुक्ति मन्त्र,
गढ़ना है असली लोकतंत्र!
आवाज उठाएगी जनता,
बहरा शासन थर्राएगा।
जब जनता मिलकर जागेगी,
तब नया सवेरा आएगा!
जनता जागेगी तो छू लेगी स्वर्ण-कलश! जन मंदिर का स्तंभ बना लेगी
यह अपने हाथों को।
फिर, किरणों का कोणार्क न ढ़हने पाएगा,
शिल्पी का शिल्प अमर होगा,
कवि को बादल में इंद्रधनुष
के सपने उफ़ने दिखेंगे।
सबके मुख में रोटी होगी,
हर बेघर को घर भी होगा।
हर नंगे को तन ढकने भर
खादी होगी।
माँ को होगी साड़ी,
चूनर दुल्हनिया को...
बहना के हाथों में कंगना।
आँगन कपास के फूलों से
हँसता होगा दुपहरिया में!
जनशक्ति जगेगी जभी देश के कण-कण में, जन जीवन में उल्लास शक्ति का आएगा। जिसकी बाँहों में जितना भर पौरुष होगा, उस पौरुष भर,
इस तीन रंग के झंडे को,
उतना ऊँचा फहरायेगा।
जनमत तो ऐसा अंकुश,जो
पल में इतिहास बदलता है।
जनतंत्र देश की जनता में
इतनी मेधा है, हिम्मत है!
इतनी उत्साहिल यहाँ जवानों की टोली, सीमा पर आने वालों की
जो रेख मिटाया करती है।
जनता के जगने से जगता
इतिहास पुरुष!
उस कालजयी के आने का
जनता ही मार्ग बनाती है।
अब खौल रहा है जन-जीवन,
पूरा समाज अकुलाया है।
शोषित समाज के धीरज की,
सारी सीमाएँ टूट रहीं।
कवि देख रहा-
जन के मन का
विद्रोह जगा ही जाता है।
जब राम उठा लेता है शर,
मायावी रावण मरता है।
तम को प्रकाश की आँधी में,
निश्चय झुकना ही पड़ता है।
सुनता है कौन किनारे की,
जब बाढ़ नदी में आती है।
युगधर्म नया बन जाता है
जब जनता जोर लगाती है।
आँधी आने के पहले की
चुप्पी भी तो कुछ होती है।
जब मेघ बरसना होता है,
आकाश मौन हो जाता है।
पहले तो धुँआ निकलता है
फिर आग सुलगने लगती है
चंदन के वन से भी उठती है
लाल लपट,
जब घड़ा पाप का भरता है,
विद्रोह स्वतः जग जाता है।
मानवता जब अकुलाती है,
तब नया मसीहा आता है।
बढ़ रहा नया नेतृत्व
काल के शिखरों पर,
मादक बसंत के पाँवों की
ध्वनि पुनः सुनाई पड़ती है।
पतझड़ का मर्मर, फूलों को
खिलने से रोक न सकता है।
हम चाह रहे हैं
व्यक्ति-व्यक्ति में नैतिकता
आदर्श नया!
नूतन समाज की रचना का
प्रारंभ, व्यक्ति से करना है।
गढ़ना है हमको नया मनुज,
पढ़नी है हमको नई ऋचा,
ढूँढनी हमें है निशा-निशा!
हम नींव बनाएँगे पक्की,
हर कलश चढ़ाने वाले को,
पहले दीवार बनानी है।
ओ गगन बिहारी नेताओं!
यह धरती तुम्हें बुलाती है।
केवल बादल की छाया से
मिट्टी की प्यास न जाती है।
समता,सर्वोदय,सत्य,अहिंसा,
देश प्रेम-
केवल मंचों की बातें हैं,
जो ढोंगी लोग सुनाते हैं।
इसके असली अनुयायी को,
सूली पर टाँगा जाता है ।
थूका जाता ईसा मसीह के मुखड़े पर, सुकरात सत्य के चलते ही
विष का प्याला पी जाता है ।
मंसूर काटकर झोंक दिया जाता
सत्ता की ज्वाला में,
लूथर प्यारी मानवता की
पूजा में मारा जाता है।
सच कहना ही हो गया पाप
झूठों की गंदी नगरी में ?
सच्चाई बैठी कोने में,
किसकी समाधि पर रोती है?
ओ भारत के सामन्तों! अब भी होश करो, मालूम नहीं शायद तुमको-
अब प्रजा नहीं है रैयत किसी हुकूमत की। जो सबसे ऊँची सत्ता है?
वह और न कोई- जनता है।
अवसर आने पर यही कभी
धाराएँ मोड़ दिखाती है।
जो दूब असल होती है
अपनी मिट्टी की,
रौंदी जाने पर ही उसमें
असली हरियाली आती है।
ओ दिल्ली के भगवानों!
अब भी वक्त बहुत,
तुम बंद करो यह चक्की अपने शोषण की। अब बंद करो धंधा,भाषण आश्वासन का- मत करो घिनौना व्यंग्य देश की जनता पर, तुम मोह छोड़ दो राजा के सिंहासन का।
दिल्ली जन-जन का तीरथ है,
मंदिर,मस्जिद, गुरुद्वारा है।
गिरजा है यही ईसाई का,
यह आँगन बहना-बहना का
यह घर है भाई-भाई का!
हर एक नागरिक बेटा धरती मैया का,
हर एक नागरिक भैया अपने भैया का।
सब धरती के, धरती सबकी,
सबका बंजर, परती सबकी।
दुख भी सबका, सुख भी सबका,
सबका बसंत, पतझड़ सबका!
यह मातृभूमि तो सबकी है ।
अधिकार चाहने के पहले,
कर्तव्य हमारा है, इसको
हम याद रखें, आबाद रखें...
आजाद रखें...!
बर्बादी करने वालों को,
बर्बाद बनाना लाजिम है।
चाहे जो हों गद्दार!
भले ही भाई हो...
हम सहन करेंगे नहीं,मुल्क से गद्दारी।
गद्दार आदमी दुश्मन है,
हम उसको गंगा-यमुना की
इस रेती में दफना देंगे।
बाहरी शत्रु जो आयेंगे,
लड़ने हमसे सीमाओं पर-
चाहे अजगर के वंशज हों?
अथवा नादिर, चंगेज रहें,
हम उनको लौह भुजाओं की
ताकत का जोर बता देंगे।
हमने पड़ोस को,खूनी के
पंजों से मुक्त कराया है।
दुनिया का नक्शा बदला है,
नूतन इतिहास बनाया है।
लोहू से लिखते आए हैं,
हम किस्सा नई जवानी का।
'सोनार बांगला' बना-
श्रेय इसका है, वीर जवानों को।
शरणागत को जो मिली शरण,
उसका भी श्रेय किसानों को।
-संपूर्ण देश की जनता का आभार,
कि इसने युद्ध किया।
है धन्यवाद इसको, जिसने!
बिषधर का फण भी कुचल दिया।
होता है नेता कौन भला!
जो जय अपनी मनवाता है?
अपने माथे पर विजय तिलक!
अभिमानी कौन लगाता है?
अवसरवादी नेताओं को
यह बात! हमें समझानी है।
भारत माता का हर बच्चा,
भारत का भाग्य विधाता है।
चूड़ियाँ तोड़ कर रोती है,
जब-जब शहीद की विधवाएँ,
बेटों की याद लिए पल-छिन
बिसुरा करती भोली माएँ!
जब डूबा करती बहनों की
राखियाँ लहू की धारा में,
जब आजादी की रक्षा में
कुछ वीर युवक कट जाते हैं-
भारत के नेता दिल्ली में
भारी 'जय दिवस' मनाते हैं।
केवल चुनाव के अवसर पर,
यह झूठे वादे करते हैं।
'जनता जनार्दन है', कहकर-
जन-जन का नाम सुमरते हैं।
कबतक बहलाई जाएगी,
जनता इन झूठे वादों से ?
यह कबतक ढूँढेंगी चुनाव-चिन्हों में,
गाय-बछड़ुओं को?
कातेगी कब तक 'चरखा' अपने आँसू का?
किस 'दीपक' से जागेगा जीवन में विहान?
कब 'गेहूँ' की रोटी होगी हर के मुख में?
कब 'बरगद' की छाया होगी हर के सुख में?
कब सारा भारत एक प्रभाती गाएगा?
संसार मांगता आया है इससे प्रकाश, आखिर कब तक इस कुहरे में,
फुलझड़ी, पटाखे, दीपों से,
अंधेरे की आजादी का-
यह जश्न मनाया जाएगा?
अब वक्त जगाता है हर सोने वाले को,
तुम जगो पुरुष, नारियों जगो!
देखो पूरब के अंचल में
सतरंगा सूरज निकल रहा!
चल रहा काल काल का रथ,
सोने के पहियों पर।
किरणों की घोड़े दौड़ रहे हैं तेजी से,
कानों में जिनके चलने की अब
टाप सुनाई पड़ती है
यह पूर्व भूमिका है युगांत हो जाने की।
हम अलख जगाने निकले हैं,
हम अलख जगाकर मानेंगे।
हम बैर प्रगति के काँटों से,
जब तक जीयेंगे, ठानेंगे।
पीढ़ियाँ चलेंगी जिस पथ पर,
उस पथ को मुक्त बनाना है।
कल के सपनों का मूर्त रूप,
हमको गढ़ते ही जाना है।
जो लोग खड़े हैं रेती पर,वे भूले हैं।
यह धरती मैया सीने से,
हर बेटे को चिपकाएगी।
कल गंगा-यमुना खेतों की
खुद प्यास पूछने आएगी।
जो लोग छिपे हैं जंगल में,
उनको सड़कों पर आना है।
हम सब मिलकर चट्टानों पर,
गेहूँ की फसल उगायेंगे।
जो काम करेगा- खाएगा!
हर गाने वाला- गाएगा!
हम एक देश के वासी हैं,
हम एक सत्य के पूजक हैं,
आजादी सबकी पूजा है ।
आजादी सबकी यमुना है,
आजादी सब की गंगा है।
सबका अभिमान हिमालय है,
सबका वरदान तिरंगा है।
गद्दी के दावेदारों! युग की बात सुनो...
अब जाग रही जनता, माटी अंगड़ाती है। उदयाचल से उतरी कंचन की किरण-परी,
पुरवा के स्वर पर गूंज रही,
नवयुग की नई प्रभाती है।
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