"जनता जाग रही है" -प्रभाती गणतंत्र जिन्हें प्यारा है, वैसे लोगों को पूछना चाहिए नेता से- क्या नेताओं का कर्म देश में भ्रटाचार बढ़ाना है? क्या नेताओं का धर्म देश की ज्वाला को उकसाना है? जनता जिसको चुन लेती है, उसको रहनुमा समझती है। आखिर ये नेता कैसे हैं, जो दिशाहीन जनजीवन की राहों को रोका करते हैं? ये लोकतंत्र की छाया में असली अधिनायकवादी हैं। करते जब कभी प्रलाप मंच के ऊपर से, तब अवसरवादी शिष्यों की जयघोष सुनाई पड़ती है। जनता जब कभी दिखाती है काला झंडा, तब इसके सीने पर अंधी गोलियाँ चलाई जातीं हैं। ये शांतिपूर्ण हड़तालों को, घेराव, जुलूस, सभाओं को, सत्याग्रह को... अथवा भूखों की मांगों को पागलपन की संज्ञा देकर सत्ता का बोझ उठाते हैं। हल्ला- गुल्ला, नारेबाजी, हड़ताल, प्रदर्शन, तोड़-फोड़, ये सारी बातें ऐसी हैं, जो इनको बहुत अखरती हैं। गौतम, गाँधी के पूजक हैं, इनको अशान्ति से नफरत है। दिल्ली में श्वेत कपोतों को, इसलिए उड़ाते आए हैं। मरने के पहल...
बड़ी डगरिया उथल-पुथल की हलचल मन के गाँव में, कहती है दुपहरिया मुझसे चल रे! चल-चल छांव में! डगर-डगर पर ठहर-ठहर कर देख लिये तूफ़ान भी, मरघट-मरघट अलख जगाकर पाये मैंने प्राण भी! लहर-लहर पर चाँद लहरता, पहर-पहर पर रात है, झिहिर-झिहिर कर बह-बह जाती, तन-मन में बरसात है। मन के मन में घुल-घुल जाती ढुलमुल-ढुलमुल आस रे! भाव-भाव में, छन्द-छन्द में, तान-तान में हास रे! मोड़-मोड़ पर, छोर-छोर पर, कोर-कोर पर गान है, बात-बात पर, पात-पात पर, डगर-डगर निर्माण है। पृष्ठ-पृष्ठ रच रहा मुसाफ़िर, पंक्ति-पंक्ति को जोड़कर, तिनका-तिनका, टुकड़ा-टुकड़ा, बिखरे फूल बटोरकर। द्वार-द्वार पर अलख जगाकर, पार-पार पर गीत भी, राह-राह पर, चाह-चाह पर, थिरक रहा संगीत भी, अरी गगरिया! छलको छल-छल, पल-पल चंचल पाँव रे! पीछे मेरे कांटे जंगल दलदल आगे छाँव रे! - शिवदेव शर्मा 'पथिक'
डूबती नैया न मेरी तुम अगर पतवार देते! एक स्वर संकेत का जीवन चलाता, कूल पर नैया नहीं पतवार जाता, पथ न चलता,पाँव पंथी हीं बढ़ाता, पार जाकर गीत गाता तुम अगर झंकार देते! चाहिए इंसान को इंसान केवल, है अगर भगवान तो इंसान केवल, हो रहा मैं आज कातर देख पल- पल, स्वयं मैं भगवान होता तुम अगर अधिकार देते! आ रही है मौत की घाटी निकटतर, जा रही है जिंदगी मेरी सरककर, मानवों! मुझको पकड़ लो आज कसकर, मैं मरण से जूझता यदि सांत्वना दो चार देते! - शिवदेव शर्मा 'पथिक'
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