16.इस निस्सीम प्रीत के दर की

 इस निस्सीम प्रीत के दर की,

हर आहट  ने  तुम्हें  उचारा ।

सच कहती हूँ मेरे दिल की,

हर धडकन ने तुम्हें पुकारा।।


धरती की छाती पर उमडे,

घिर आये काले घन जैसे ।

तुम मेरी झुलसी धरती पर,

वर्षा के अमृत कण  जैसे।।


भीग तुम्हारी नेह-धार में,

इस जीवन को सदा दुलारा ।

सच कहती हूँ मेरे दिल की,

हर धडकन ने तुम्हें पुकारा।।


मिल जाएँ जल की दो बूँदें

जैसे प्यासे को मरुथल में ।

आशाओं के कमल खिले ज्यों ,

घोर निराशा के दल-दल  में।।


खो जाती लहरों में नैया,

तुमको पाकर मिला किनारा ।

सच कहती हूँ मेरे दिल की,

हर धडकन ने तुम्हें पुकारा।।


पावन प्रेम तुम्हारा प्रियतम,

मेरे जीवन की सरगम है।

मिलन तुम्हारा और हमारा,

दो सरिताओं का संगम है ।।


"पथिक" हमारा प्यार असीमित,

जितना ये अम्बर है सारा ।

सच कहती हूँ मेरे दिल की,

हर धडकन ने तुम्हें पुकारा।।


---"पथिक रचना"



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