सब कहे अप्रैल फूल, आया नया जब साल है
वाह रे! माँ भारती के देश का क्या हाल है
नकल में अक्कल गवाएँ मूर्ख बन कर खुश सभी
तीर तरकस में सजाए ताक बैठा काल है
कस रहा मनु के मनस को एक शिकंजा लोभ का
देश का नक्शा सहमता खूब फैला जाल है
तंगहाली झेलता चूल्हा गरीबों का यहाँ
बढ़ रही हर रोज कीमत मुश्किलों में दाल है
धर्म इंसा का निभाना चाहता कोई नहीं
घोर संकट से घिरा है वक्त की क्या चाल है
ठग बना है आदमी बहुरूपिया सा वेश धारे
पथिक अब किस पंथ जाए पूछता सवाल है
क्यों नहीं मति बदल देते आप हमारे तात
भाई चारा व्याप्त हो मिल कर रह लें साथ
पथिक रचना
नमन भावों के मोती
दोहा लेखन "जीवन"
18/11/2018
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