17.तानों का विष
रात्रि जितनी शांत है मन उतना हीं अशांत...
और माथे पर टंगी घड़ी है जो टिक... टिक... टिक... टिक... किए जा रही।
मुझे नींद नहीं आ रही। जबरदस्ती सोने की कोशिश में टाइम-वेस्ट हो रहा।
बहुत जोर से गाना आ रहा...
ओ माँझी रे.....
अपना किनारा नदिया की धारा है...
नहीं तो जोर से लिखना आ रहा...
नहीं तो कम से कम पढ़ना आ रहा। पर सोने की कोशिश करनी है क्योंकि रात को जगी तो सुबह उठ नहीं पाऊँगी।
टाइम पर सोना-जागना चाहिए कि नहीं बताओ...?
पर टाइम पर सोने-जागने वाले एक दिन सदा के लिए सो नहीं जाते क्या ...!
कब तक कंट्रोल करोगे यार जिंदगी तुम हमें...!
घड़ी से घृणा होती है बाजटाइम...
कला का उपासक, घड़ी का उपासक नहीं हो सकता।एक फिक्स टाइम टेबल मुश्किल हीं नहीं नामुमकिन है।
वो अपनी अंतरात्मा की आवाज़ से जागता-सोता है। उसकी कला उसकी लगन हीं उसे जगाती है, लोरियाँ सुना थपथपा कर सुलाती है। साधना उसका उदय है और समर्पण अस्त। ईश्वर का विशेष कृपा पात्र होता कोई कलाकार उसे घड़ी दिखाना उसपर अत्याचार करना है।
उसकी मर्जी से पहर हो कि
उसको तो उसकी अपनी लहर में मस्त होने दो...
मत बाँधो उसके माथे पर घड़ी...
टिक-टिक... 1
टिक-टिक... 2
टिक-टिक... 3
टिक-टिक... 4
ये टिक-टिक की आवाज़ उनके कानों से उतर धड़कनों की राग को बेसुरा करती हुई पेट की चक्की में पहुँचती है और बदहजमी का शिकार बेचारा कलाकार अपनी कला के साथ दम तोड़ देता है।
तानों का विष पीते-पीते,
बिना मान के जीते-जीते,
शब्दों की तो मौत हो गई,
इन होठों को सीते-सीते।
अपना दुखड़ा किससे गाऊँ,
जले हाथ किसको दिखलाऊँ,
वैद्य ठग रहे बन कर भोले,
किससे मैं उपचार कराऊँ!
मेरे जीवन के जलने से,
जिन अपनों का यज्ञ हुआ है,
जिस-जिस ने दी भागीदारी,
मेरी उनके लिए दुआ है ।
एक वचन मुझको तुम भरना,
अग्नि-समर्पित जब भी करना,
मेरे घर की घड़ी रोक कर...
तभी चिता पर मुझको धरना।
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