10 विद्रोही
नींव एक रखा था! पलकें झपकाए बिन...
उनके चटकने की आहट से आहत हूँ...
सहमी सी...
गुनती हूँ, धुनती हूँ, बुनती हूँ...
चढ़ती-उतरती इन साँसों में
कोरी कराहें हैं...
छूटी प्रतीक्षा है, मिथ्या हर शिक्षा है...
सच कहूँ तो मर चुकी जीने की इच्छा है...
सपने जो पाले है, क्या मैं करूँ उनका!
नैनों पर ताले हैं...
दुनिया है भीड़ भरी, अपनों के लाले है...
सच का है मुँह काला, झूठों का बोलबाला...
जीसस को सूली, सुकरात को मिला हाला...
खुद के हीं ज्ञान से, ज्ञानियों को खतरा है...
ओशो उठा तो मची घोर हलचल थी..
न जाने कितने बहाने थे वार के...
आखिर में चैन मिला ओशो को मार के...
मैं हूँ विद्रोही, हाँ मैं हूँ विद्रोही! ये मैं सबसे कहती हूँ...
किंतु सदा से ही हर पीड़ा सहती हूँ...
ऐसा नहीं होगा, अब तो नहीं होगा...
सहना है उतना ही, जितना सही होगा...
अब लो...! यह ज्ञान तो मैंने है छाँट दिया...
तरीका विद्रोह का बच्चों में बाँट दिया...
किंतु अब देखिए तो हालत हमारी!
हमी से है सीखा, सीख हमपर हीं दे मारी...
वाह रे वाह! मेरी पीढ़ी की हर नारी...
संबल बनी सबका फिर भी रही बेचारी...!
मैं हूँ विद्रोही, हाँ मैं हूँ विद्रोही...
ये मैं सबसे कहती हूँ ...
किंतु सदा से ही हर पीड़ा सहती हूँ...
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