1.बंध गए

 बंध गए आप-हम एक हीं डोर में,

फिर क्यूँ छूटे सहारे किसी छोर में, 

इस जमाने की तानातनी क्या करें, अनसुनी बात अपनी रही शोर में।।

 

हम उतरते गए प्रेम के ताल में ,

था भरोसा किनारे का हर हाल में, तैरने की कला हमको आई नहीं, 

डूब कर रह गए इस भंवर जाल में।।


जब से लिखने लगे अपने मन की व्यथा, 

आँसुओं से लिखी हमने कितनी कथा,

गीत विरहा के गाकर सभा में लगा,

हाए किसने रची तालियों की प्रथा।।

 

छटपटाहट लिए मन मचलता रहा,

टूट कर रोज फिर से संभलता रहा, तुमको पाने की जिद में बहुत मैं जली, 

यह बदन मोम जैसे पिघलता रहा।।


रोज आते हो तुम स्वप्न के द्वार तक, जागरण में रहे पलकों के पार तक, तुम न आए तेरी याद जाए नहीं,

सूना मेरा सदन तेरे दीदार तक।। 

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