22.हर लम्हा मैं
हर लम्हा मैं कुदरत के
करीब हो जाऊँ...
मेरी रूह एक सुकून में खो जाए ...
न कोई कोलाहल हो...
न हो कोई व्यग्रता...
सब दुःख भूल कर...
ऐसी मदहोश हो जाऊँ...
दूर किसी मंदिर से आती ...
घण्टियों की मधुर धुन...
और गूंजता मंत्रोच्चार
का पावन संगीत...
हर दिशा-दिशा पुकारे
जैसे लेकर मेरा नाम...
प्रतिध्वनि कुछ ऐसी!
कि खुद से खुद की
पहचान करा जाऊँ...
इस अनुगूंज में ऐसी खो जाऊँ ...
कि धन, पद, मान सब छोड़
कर बस प्रभु की हो जाऊँ
बस प्रभु की हो जाऊँ...
'पथिक रचना'
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