बड़ी डगरिया उथल-पुथल की हलचल मन के गाँव में, कहती है दुपहरिया मुझसे चल रे! चल-चल छांव में! डगर-डगर पर ठहर-ठहर कर देख लिये तूफ़ान भी, मरघट-मरघट अलख जगाकर पाये मैंने प्राण भी! लहर-लहर पर चाँद लहरता, पहर-पहर पर रात है, झिहिर-झिहिर कर बह-बह जाती, तन-मन में बरसात है। मन के मन में घुल-घुल जाती ढुलमुल-ढुलमुल आस रे! भाव-भाव में, छन्द-छन्द में, तान-तान में हास रे! मोड़-मोड़ पर, छोर-छोर पर, कोर-कोर पर गान है, बात-बात पर, पात-पात पर, डगर-डगर निर्माण है। पृष्ठ-पृष्ठ रच रहा मुसाफ़िर, पंक्ति-पंक्ति को जोड़कर, तिनका-तिनका, टुकड़ा-टुकड़ा, बिखरे फूल बटोरकर। द्वार-द्वार पर अलख जगाकर, पार-पार पर गीत भी, राह-राह पर, चाह-चाह पर, थिरक रहा संगीत भी, अरी गगरिया! छलको छल-छल, पल-पल चंचल पाँव रे! पीछे मेरे कांटे जंगल दलदल आगे छाँव रे! - शिवदेव शर्मा 'पथिक'
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