41. Asru का करके

 अश्रु का करके वरण ।

क्षुब्ध कर अंतःकरण ।

पा सकोगे क्या भला !

ओढ़ मिथ्या आवरण।।


अनुभूतियों का हो मनन ।

हो दुरभिसन्धि का शमन ।।

हर वेदना को भूल कर ,

अब हो पथिक सुंदर सृजन ।।

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