7.जिंदगी हर कदम
जिंदगी हर कदम स्वर बदलती गई
सिद्धियों की विकल साध पलती गई
कैसा अंजन रे!आँखों में अभिमान का
हम अकड़ते रहे उम्र ढलती गयी
जिंदगी हर कदम स्वर बदलती गई
पीके आए हो जैसे सुधारस सभी
बात हर आज की कल पे ढ़लती गई
जिंदगी हर कदम स्वर बदलती गई
मौत श्रृंगार करती रही शौक से
रूप की चाँदनी आँख मलती गयी
जिंदगी हर कदम स्वर बदलती गई
जाने वाले किसी के न रोके रुके
जानते थे मगर आस छलती गई
जिंदगी हर कदम स्वर बदलती गयी
हर मरन ने गढ़ा बुद्ध सा आचरण
देह जब-जब चिताओं में जलती गयी
जिंदगी हर कदम स्वर बदलती गयी
हर मरन ने गढ़ा बुद्ध सा आचरण
देह जब-जब चिताओं में जलती गयी
जिंदगी हर कदम स्वर बदलती गयी
रश्मियों ने लिखी राह फिर से नयी मिल गई फिर दिशा साँस चलती गयी
जिंदगी हर कदम स्वर बदलती गई
सिद्धियों की विकल साध पलती गई
जिंदगी हर कदम स्वर बदलती गयी
रश्मियों ने लिखी राह फिर से नयी मिल गई फिर दिशा साँस चलती गयी
जिंदगी हर कदम स्वर बदलती गई
सिद्धियों की विकल साध पलती गई
Comments
Post a Comment