48.Apni parchhai

 अपनी परछाई से दूरी लगती है

दुनिया अनचीन्ही अनजानी  लगती है


छोड़ो दुनिया की बात करेगा क्या 

कोई

हर रिश्ते की बखिया उधड़ी सी लगती है


दिल निचोड़ कर अपना रेगिस्तान किया

अब आँखो की बगिया सूखी लगती है


जहर पचाना होता खेल नहीं लेकिन 

जहरीले की फितरत डसना लगती है


 चल रही हवा माकूल शहर की थी

लेकिन

किसी की नादानी से आँधी आई लगती है


व्हतुर सयाने कुछ  होते कोयल जैसे

चालाकों को चोट कहाँ कब लगती हैं


पलक पांँवड़े बिस्तर दो पालो पोसो 

सुनो पथिक!  करुणा मूरख की

 लगती है

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