44 मिलन ant hai
छलना होती प्रेम प्रतीक्षा
अकुलाया सा रहता है मन
उलझा यौवन भार बना है
बोझिल है ये एकाकीपन
मिलन अंत है मधुर प्रेम का और विरह होता है जीवन
आँचल अनुरागी, रीता है...
पूनम वाली रात अँधेरी
जानेवाले कब तक लौटें
युगो-युगों की होती देरी
शबरी कब तक राह निहारे कब तक रोज बुहारे आँगन।
मिलन अंत है........
सूना द्वार रहेगा कब तक
और अधूरी प्यास रहेगी
रुकी हुई सी है यह साँसे
कब तक झूठी आस रहेगी
चलना कब तक एक राह पर ढोना कब तक अनजानापन।
मिलन अंत है.......
कविताओं से स्याही सूखी
गीत सभी स्वरभंग लिए हैं
एक काँपती हुई तूलिका
थमे हुए कुछ रंग लिए हैं
बगिया लाल गुलाबों वाली पग-पग पर है बंजारापन।
मिलन अंत है......
प्रेम किया है मैं ने ही गर तुमको कोई दोष नहीं है
मोह! मकर जाले के जैसा फँस जाओ कुछ होश नहीं है
छिपा हुआ सागर लहरों में लेकर यह मन का उद्दीपन
मिलन अंत है.......
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