41.बोझल हो
बोझिल हो जब थक जाए मन,
शरणागत हो प्रभु के आँगन।
और कभी जब दुःख दहलाए,
व्याकुल मन करता हो क्रंदन।
चित्त कहीं जब तनिक लगे ना,
करो आप मन ही मन मंथन।
यह काया बस उतनी ही है,
जितना चाहे अलख निरंजन ।
सुर साधो तो यह जीवन हो,
आलापों का मधुरिम गायन ।
पतझड़ की ऋतु भी हो जाए,
आशाओं का रिमझिम सावन।
"पथिक रचना"
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