40. नीत फिसलते
नित फिसलती ज़िन्दगी से मोह क्यों बढ़ने लगा।
हर घड़ी क्यों बढ़ रही कुछ प्राप्त करने की तृषा।।
बढ़ रही इस उम्र में क्यों कामना की तिश्नगी ,
चाहतों की मस्तियों में भाँग सा चढ़ता नशा ।।
हो रहा व्याकुल हृदय क्यों भावना कैसी जगी,
लालसा जीवंत होती स्वप्न फिर पलने लगा ।।
आँख में भर कर उमंगे ले रही तृष्णा हिलोरें ,
प्रज्ज्वलित फिर हो उठा है दीप अरसे से बुझा ।।
फिर"पथिक"को घेरती हैं कल्पना की कुछ उड़ानें।
इक अजाने पथ पे लेके जा रही मुझको भगा ।।
--- "पथिक रचना"
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