36.basant
हमने देखे हैं कई बसंत...
बचपन था तब! हमपर थे पर,
उड़ते फिरते थे हम नभ पर,
पत्तों-पत्तों का पता हमें,
हम कोमल कोंपल शाखों पर,
सरसों का पीलापन हमसे!
नभ का नीलापन भी हम से,
फूलों में खुशबू हम भरते,
तितली के पंख रंगा करते,
कोयल हमको कॉपी करती,
वरना वह कूक कहाँ भरती?
बागों को और बगीचों को,
खिलने का और महकने का,
आदेश हमीं से मिलता था,
उस वक्त हमीं रखा करते थे!
वक्त बाँधकर मुठी में...
फिर बीत गए कुछ एक बसंत...
अब हवा जरा सी बहक गई,
लो ! तरुणाई चहक गई,
मन का भोलापन जिंदा था,
उड़ता बेफिक्र परिंदा था,
फूलों के रंग हुए गहरे,
यौवन था!और लगे पहरे,
गलतियाँ लगीं बुद्धिमानी,
हर चिंता थी आनी-जानी,
कुछ भी थी परवाह नहीं,
जीवन है क्या! थी थाह नहीं...
अलमस्ती थी, उतावलापन!
उत्साह लिए चंचल था मन,
भरपूर नींद भरपूर स्वप्न,
सुखद भोर, निश्चिंत निशा,
छाया बसंत हर दिशा-दिशा...
इस तरह गए कुछ और बसंत...
चालीस बयालीस और पचास!
क्रमशः आते रहे पास...
अब है बसंत! कुछ नहीं खास,
बदली ऋतुएँ बस! गया मास,
होता न कोई जादू-टोना,
मन एक उपेक्षित सा कोना...
फूलों से बात नहीं बनती,
निंदिया से रातों की ठनती,
अब स्वप्न रहा कुछ अल्प नहीं,
गोली के बिना विकल्प नहीं,
काश कभी ऐसा होता...
पतझड़ का मौसम हो फिर भी,
मन का बसंत खिलता होता...
आए बसंत यह अभिलाषा
जागे आशा!जागे आशा~पथिक रचना
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