34.सावन
देखो न!
सावन का ऋतु आ गया है...
तुम्हारे प्रेम से भींगा मन!
छंदानुवाद करने लगा है....
धूप से जले वन-उपवन मेंअब,
रंगबिरंगा रंग समा गया है...
तुम कब आओगे...!
बादलों से होड़
लगा बैठी हैं मेरी पलकें...
आँसुओं से धुलकर यादें
और भी ताज़ा हो गईं हैं
बाकी सब धुंधला गया है
बताओ न !
तुम कब आओगे...!
मेघ की गर्जनाओं का है शोर,
या कि मेरे धड़कनों का जोड़-तोड़...
है बन गई मेरे हृदय की पीड़,
हाए!तुम्हारी सुधियों की जंजीर...
मन बंधने लगा है
कहो न!
तुम क'पथिक रचना'
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