33.lamhe
वह लम्हें कितने अच्छे थे....
जब तुम मुस्काया करते थे
तेरी आँखों के सागर में
जब मेरे अक्स उभरते थे
जब थाम के यूँ तुम हाथ मेरा
आश्वास जताया करते थे
वह लम्हें कितने अच्छे थे...
जब भी तुम हँसकर मुझको
इक चपत जमाया करते थे
और सोने जो लग जाऊँ मैं
गुदगुदी लगाया करते थे
मेरी इक आवाज जो सुन लो
तुम भागे आ जाते थे
वह लम्हें कितने अच्छे थे....
जब किसी खेल में हारूँ तो
तुम बहुत चिढ़ाया करते थे
और जब मैं रुठ जाती थी
तुम मुझे मनाया करते थे
यूँ हीं बेमतलब दूर कहीं
हम दूर कहीं हो आते थे
वह लम्हें कितने अच्छे थे...
तुम मेरी सुबह के सूरज
जीवन में रंग यूँ भरते थे
जब भी होती थी धूप कभी
तुम छतरी बन कर तनते थे
मेरी खुशियों के लिए सभी
तकलीफ उठाया करते थे
वह लम्हें कितने अच्छे थे...
तुम मेरी घोर अमावस में
दीपक प्रकाश बन जलते थे
तुमसे हीं थी चाँद रात
बन चादर लिपटे रहते थे
मुझपर कोई मुश्किल आये
"मैं हूँ न" ऐसा कहते थे
वह लम्हें कितने अच्छे थे...
संग तेरे चाहे आँधी हो
मेरी हिम्मत बन जाते थे
चाहे टूटे बिजली कोई
तुम मेरा साथ निभाते थे
मुझको घमंड हो जाता था
जब हाथ पकड़ तुम लेते थे
वह लम्हें कितने अच्छे थे...
फिर धीरे से सबकुछ बदला
था वक्त रेत जैसे फिसला
हम मिलने से मजबूर हुए
और दो दिल गम से चूर हुए
कुछ घाव दिलों में गहरे थे
वादों के धागे कच्चे थे
वह लम्हें कितने अच्छे थे...
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