31.नदिया सागर से मिलने को

 नदिया सागर से मिलने को जाती है ।

इसीलिए वो गीत मिलन के गाती है ।।


पद वन्दन करने को सागर टेर रहा ।

जाने कब से पंथ नदी का हेर रहा ।।

लहर लहर उस मिलन हेतु अकुलाती है।

नदिया सागर से.....................…...।।


तारों की चादर अब निशा समेट रही ।

ऊषा कर अंधियारे का आखेट रही ।।

अलसाई जलधार पलक झपकाती है ।।

नदिया सागर से....................।।


गोद लिए बैठा है देखो सिंधु गगन ।

कल कल बहती सरिता में है चन्द्र मगन ।।

इधर चाँदनी आभा धवल लुटाती है ।।

नदिया सागर से ......................।।


सागर की लहरों पर अब अरुणोदय है।

सोने सी किरणों का ये भाग्योदय है ।।

मिलन दृश्य दर्शन की बेला आती है ।।

नदिया सागर से .....................।।


"पथिक"नदी के हृदय बढ़ी अकुलाहट है।

सम्भवतः ये सद्य मिलन की आहट है ।।

लहर ज्वार पर हो सवार इठलाती है ।।

नदिया सागर से.........................।।


नदिया सागर से मिलने को जाती है ।

इसी लिए वो गीत मिलन के गाती है ।।


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                     ---"पथिक" रचना



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