30.सभी बंधनो से मुक्त
सभी बंधनों से मुक्त
नहीं होना चाहती मैं,
जीवन से प्रेम करना बेमानी सही !
मैं नहीं होना चाहती उससे परे...
नहीं चाहती मैं,
कि कोई मेरा मोह भंग करे...
अनंत दिशा की ओर,
खुशनुमा बयार सी चलना चाहती हूँ...
जीवन की आहट महसूस हो मुझे,
अपनी हर धड़कन में...
आखिरी साँस तक,
मृगतृष्णा सी खुद को छलना चाहती हूँ...
धूप हो या छाँव,
चाहे काँटे बिछे हों हर ठाँव..
जीवन ! तुम्हारे यथार्थ के शूल में,
फूल सी खिलना चाहती हूँ...
नहीं ओढ़ना चाहती मैं,
निर्मोही रजनी की चादर...
सुनहरी रोशनी का वस्त्र पहन,
ज्योतिपुंज सी,
अँधियारे में दमकना चाहती हूँ...
लाख रंग बदलो तुम मौसम की तरह ,
ओस की बूँद सी पत्ते पे ठहरना चाहती हूँ...
मैं अभी चलना चाहती हूँ ,
हाँ! अभी चलना चाहती हूँ...
-पथिक रचना
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