25.तुमको पाकर हम खुद को
तुमको पाकर हम खुद को, खो आये हैं ये लगता है।
पल-पल बीज प्रतीक्षा का, बो आये हैं ये लगता है।।
कितनी जल्दी ये बैरी, जाने की बेला आ पहुँची।
तुमसे छुप कर दृश्य सभी, रो आये हैं ये लगता है।।
तुमको पाकर हम खुद को, खो आये हैं ये लगता है।
रोज लिखा करते थे मिलकर ,प्रीत-पगे पन्ने दोनों।
नयनों की बरसात से वो, धो आये हैं ये लगता है।।
तुमको पाकर हम खुद को, खो आये हैं ये लगता है...
घुली हुई मेरी साँसों में, नेह-सुगंध तुम्हारी है।
गन्धित बासन्ती ऋतु सँग, सो आये है ये लगता है।।
तुमको पाकर हम खुद को, खो आये हैं ये लगता है...
कहता रहे जमाना चाहे,दिल का लगाना ठीक नहीं।
हम सारे तीरथ मंदिर, हो आये हैं ये लगता है ।।
तुमको पाकर हम खुद को, खो आये हैं ये लगता है...
पल-पल बीज प्रतीक्षा का, बो आये हैं ये लगता है।।
~'पथिक रचना'
Comments
Post a Comment