19.प्रेम पिपासा
प्रेम-पिपासा हर प्रेमी की खता रही है,
प्यास! प्राण की विह्वलता को बता रही है,
दौड़े थे जिस सागर तक सब डगर भूलकर,
लहर चूम देखा खारापन जता रही है।
पथिक रचना
जोड़ते जोड़ते दिन बिताते रहे
मूरत तुम्हारी याद में बनाते रहे
साथ दर्द को तराश गीत गाते रहे
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