13.माँ
माँ बरसती ही रही, बनकर के निर्मल धार।
कौन ऐसी है नदी, माँ कर न सकती
पार।।
दीप वो बन कर जली हर रात में,
जूझती तूफां में झझवात में,
स्नेह की थामे सदा ही हाथ में पतवार
कौन ऐसी है नदी माँ कर न सकती पार
सूर्य के रथ की बनी वह सारथी
भोर का तारा सी वह परमार्थी
माँ चले तो चल पड़े सारा जगत- संसार
कौन ऐसी है नदी माँ कर न सकती पार
हर विपत्ति को हरा देती है माँ
हो जरूरत एक पल में दे दे जां
चल पड़ी है राह में माने नहीं वो हार
कौन ऐसी है नदी माँ कर न सकती पार
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