जा रहा नाविक अकेला
बह रही है जिंदगी की नाव सागर की लहर पर,
जा रहा नाविक अकेला ज्वार की बाहें पकड़कर
दूर है खोया किनारा आँख लहरों पर थमी है,
दाँव पर जीवन लगा दे जो- वही तो आदमी है,
वह लहर पथ का बटोही नाव लेकर जा रहा है,
आ रहा तूफान सीना खोलकर वह गा रहा है।
मस्त नैया का खेवैया,चाँदनी का पाल धर-धर,
जा रहा नाविक अकेला, ज्वार की बाँहें पकड़कर!
काल का निस्सीम सागर, आस की पतवार कोमल,
प्यास का आधार केवल नयन का नमकीन सा जल,
साधना को तृप्ति मिलती है भँवर में खेलने से,
पार जाता है मुसाफिर नित लहर को झेलने से,
चेतना का रूप गढ़ती है लहर अल्हड़ छहरकर,
जा रहा नाविक अकेला ज्वार की बाँहे पकड़कर।
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