बढ़ावा
बढ़ पाँव आगे नए पथ के राही,
तुम्हारी हीं मंजिल तुम्हें ढूँढती है।
न पूछो पता तुम किसी से डगर का,
की मंजिल तुम्हारा पता पूछती है।
मिलें शूल तुमको पड़ें पग में छाले,
न रुकना कहीं भी अरे जाने वाले।
तुम्हें टोकने को बवंडर उठेंगे,
मगर दूर जाना है दीये जला ले।
न मांगो किसी से तू नैया ठहर कर,
लहर भी लगन के चरण चूमती है।
बढ़ा पाँव आगे नए पथ के राही,
तुम्हारी हीं मंजिल तुम्हें ढूँढती है।
मुसाफिर वही जो नया पथ बना दे,
अंधेरे में चलकर नया युग बसा दे।
जो पत्थर को देकर चरण धूलि अपनी,
युगों की अहिल्या में जीवन जगा दे।
मशानो के मुर्दे तुम्हें ढूंढते है,
दिशा भी तिमिर में नही सूझती है।
बढ़ा पाँव आगे नए पथ के राही,
तुम्हारी ही मंजिल तुम्हें ढूँढती है।
जरा छोड़ते जा निशानी कदम की,
जिसे देख दुनिया भी पथ खोज लेगी।
लगेगी वहीं पर हजारों की महफ़िल,
तेरा नाम ले हर गली ये कहेगी।
बढ़े चल ओ राही! तू लू में, लपट में,
शहीदों को दुनिया नहीं भूलती है।
बढ़ा पाँव आगे नए पथ के राही,
तुम्हारी हीँ मंजिल तुम्हें ढूँढती है।
-शिवदेव शर्मा 'पथिक'
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