मैं हूँ पथिक अकेला

 मेरा नाम अकेला-

जिसका काम जुगाना केवल युग के लिए उजेला!

मेरा नाम दिवाना-

काम यही भूले भटके को असली राह दिखाना!

मैं बेबस,बेगाना-

एक लक्ष्य है ठोकर खाकर पथ पर बढ़ते जाना!

मैं गम का अफसाना-

चाह रहा हूँ मिटकर भी मैं एक नया युग लाना!

मेरा नाम खेवैया-

चला सदा लहरों के ऊपर खेता जीवन-नैया!

राही मैं युगपथ का-

थामे डोर चला करता हूँ अमर किरण के रथ का!

मैं हूँ शिव मतवाला-

सुधा उगलकर पीता हूँ मैं विष का जलता प्याला!

है कोई मस्ताना-

जो गाता हो इस मस्ती में महासृजन का गाना ?

मैं वाणी का बेटा-

सावन लिखता रहा ग्रीष्म की मरु ज्वाला में लेटा!

मैं मीरा का स्वामी-

युग की सीता जिसके पीछे चले राम वनगामी!

मैं शंकर की चोटी-

सदा भगीरथ की धरती पर मेरी गंगा लोटी!

साधक एक निराला-

पहिनाता हूँ महतिमिर को किरणों की जयमाला!

एक अथक सन्यासी-

लू लपटों में जीनेवाला एक श्रमिक अभ्यासी!

मैं तपस्वी एकाकी-

अखिल विश्व के लिए रश्मियाँ जुटा रहा सुधा की!

मैं अल्हड़ आवारा-

भटक-भटक कर एक दिशा में अटक गया ध्रुवतारा!

काम नहीं है चोरी-

छिपकर रोना यही एक है भावुक की कमजोरी!

मैं हूँ एक अकेला-

मेरे चारों ओर लगा है अरमानों का मेला!

हूँ नवयुग की आशा-

युग की पीड़ा हीं मेरे कोमल प्राणों की भाषा!

मैं सदियों का प्यासा-

प्यास लिए मर जाना कवि के जीवन की परिभाषा!

बन फूलों का माली-

सीने से चिपकाए बैठा हूँ काँटों की डाली!

मैं हूँ एक चितेरा-

बना घोंसले ढूँढ रहा हूँ अपना रैन बसेरा!

जलना जीवन मेरा-

मेरे जलने से पाती है धरती नया सवेरा!

मैं हूँ काव्य-प्रणेता-

कल इतिहास कहेगा जिसको सौ-सौ युग का नेता!

मैं विद्या का दाता-

भाग्यहीन चल चुका सफर में चलते भाग्य विधाता!

हृदय रक्त का दानी

अमर-साधना के पथ पर मैं चला मस्त बलिदानी!

मैं हूँ एक कहानी-

जिसके शब्द-शब्द में संचित सागर-लहर रवानी!

मुझमें भरी जवानी-

देकर मैंने प्यार विरह की व्याकुलता पहिचानी!

मैं सतेज अभिमानी-

सीना खोले खड़ा, बही है हवा हजार तूफानी!

कवि हूँ मैं अलबेला-

अग्नि-लहर से लिखी गई है मेरी जीवन बेला!

मैं हूँ पथिक अकेला-

इसी विश्व के लिए करोडों काँटों का दुख झेला!

एक अनोखा राही-

खड़ा हुआ हूँ सर्वोदय के पथ पर अमर सिपाही!

रह इतिहास गवाही-

तब तक लिखना है जब तक रिस रही कलम से स्याही

मैं बसंत की बोली-

लिए खड़ा हूँ मैं विराट से केसर कुंकुम, रोली!

रोली वाली झोली-

दिग-दिगंत में व्याप्त रही है-होली- होली- होली!

करुणा मेरी दासी- 

तुलसी, सूर, कबीर और मैं मीरा का गृहवासी! 

इच्छा मेरी प्यासी-

बाँट रहा मुस्कान जमाने भर की लिए उदासी! 

करुणा मेरी गाथा-

जिसके आगे झुका हुआ है प्रतिहिंसा का माथा! 

विप्लव मेरी चाहें-

एक व्यक्ति मैं बना रहा हूँ युग की सीधी राहें!

 मैं हूँ अनल प्रलय का-

लिखता केवल गीत, विश्व की महाशांति की जय का! 

मन पूजा की वेदी-

एक लक्ष्य से लाख पत्थरों की चट्टानें भेदी! आगे पाँव बढ़ाना- 

इसी चेतना से स्पंदित मेरा जीवन गाना !

मैं मंजिल अभिमानी- 

हो जाए तन होम, मगर मंजिल पाने की ठानी! 

मैं कठोर व्रतधारी- 

'पी-पी' सदा रटा करता हूँ निगल-निगल चिनगारी!

मंजिल मेरी सीमा- 

कभी नहीं हो सका आज तक चलने का क्रम धीमा! 

राही हूँ-रहबर भी-

एक समान मुझे लगती है मधुऋतु भी पतझड़ भी !

मैं युग पथिक, पथी हूँ-

किरण-पथी दुर्जेय प्रात के रथ का किरण रथी हूँ

मैं संचित चिनगारी-

यज्ञ-अग्नि जल सके हवन की मेरी पहली बारी!

गायक हूँ समता का-

नायक हूँ मैं मानवता की मर्यादा, ममता का!

मैं जागरण प्रभाती-

लिए आरती, खड़ा हुआ मैं-तम-प्रदेश की बाती! 

मुझको अलख जगाना- 

जीवन का अमृत उड़ेलकर मुझे जगत से जाना! 

मैं सूली का ईसा- 

मैंने केवल अब तक अपने पथ का पत्थर पीसा! 

युग का कवि निर्माता- 

फूट पड़ा हूँ चट्टानों से निर्झर धार बहाता!

मैं सुकरात अनोखा- 

'अहम् ब्रह्मास्मि' कहने में तनिक न मुझको धोखा!

ब्रह्मा मेरी रचना- 

खेल नहीं है किसी सृष्टि का दृष्टि वृष्टि से बचना!

कविता कवि की माया- 

अंधकार से ही बनती है कलाकार की छाया!

मैं हूँ शुद्ध पुजारी- 

मंदिर, मस्जिद नहीं मुझे तो मानवता है प्यारी! 

मनुपुत्र हूँ गर्वीला- 

आज पाटना चाह रहा हूँ छल का ऊँचा टीला!

मैं हुँकार प्रलय का- 

प्राणों में गूँजा करता है मधु-उद्घोष विजय का!

मैं कठोर सेनानी- 

भरा हुआ मेरी रग-रग में मनुष्यता का पानी! 

लिखना अपना पेशा- 

इस अछोर पतझड़-मर्मर में कोकिल का संदेशा! 

क्या न मुझी पर बीता?-

यमुना तट पर हेर रही है मेरी राधा,सीता! वंशी की स्वर-लहरी-

घटा घिरा देगी ,जलने को चीखे लाख दुपहरी!

नीलकंठ मतवाला-

अधरों पर मुस्कान कंठ में संचित काला काला! 

मेरा ताण्डव नर्तन- 

खुले तीसरा नेत्र; विश्व के अणु-अणु  में परिवर्तन! 

माटी मेरी काया- 

मगर इसी माटी पर मेरा वृंदावन लहराया! माटी का आभारी- 

अरे!इसी माटी पर लेता रूप सदा अवतारी! तन पर नहीं लंगोटी- 

मगर बिनोवा बाँट रहा है लक्ष-लक्ष को रोटी!

तलवारों की आँधी- 

रोक खड़ा है इसे वक्ष पर एक महात्मा गाँधी! 

मैं शहीद की बोटी- 

कटकर जो भी नहीं हुई है इस दुनिया से छोटी!

नव-प्रकाश की रेखा-

कहाँ आज अवकाश किसी से करुँ ज्योति का लेखा? 

मैं हूँ प्रलय प्रभंजन- 

जिसकी आँखों में रहता है भरा-धूल का अंजन!

ज्वालामुख मन मेरा-

पतझड़ की सूखी डाली पर मन का रैन- बसेरा! 

चलता पाँव बढ़ाए-

ताकि पथिक के चरण-चिन्ह छू, दुनिया मंजिल पाए! 

मत कह मुझे गुमानी-

कहीं ना ऐसा कहना ही कल हो जाए नादानी! 

मैं तो एक भिखारी-

मानवता के लिए चिता पर चढ़ने की तैयारी! 

मेरी कठिन तपस्या- 

ठोकर खाकर ही हल होती मेरी करुण- समस्या! 

कवि हूँ बहुत अकेला- 

मुझे मान-सम्मान नहीं दो,मैं ठुकराया ढेला! मैं हूँ पथिक अकेला- 

आगे-पीछे लगा हुआ है दुनिया भर का रेला!

- शिवदेव शर्मा 'पथिक'


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