पाँव बढ़े तो

आगे चला मुसाफिर उसके पीछे लम्बी राह बन गई,

कवि के मन की आह जमाने के सीने की आह बन गई!


कलम चली तो सहमा शोषण,

पाँव बढ़े तो किरण अलापी,

अपनी लघुता पर क्या रोना?

बामन ने भी धरती नापी!


चला अकेला जो भी, उसका दुनिया यहीं गवाह बन गई,

कल तक थी जो नदी आज वह छूते-छूते थाह बन गई!


एक बटोही चला अकेला,

सूने में भी पाँव बढ़ाए,

चल चलकर जलनेवाले की,

चाह यही- युग मंजिल पाए


ठुकराकर युग जिसे दुलारे, ऐसी उसकी चाह बन गई,

आगे चला मुसाफिर उसके पीछे लम्बी राह बन गई!


शिवदेव शर्मा 'पथिक'

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