सुनसान डगर

न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?
यहाँ गहराईयाँ इतनी, लहर अनजान लगती है!

उड़ाकर धूल राही ने, जगाकर पाँव से शोले,
पुकारा जोर से- 'मंज़िल'! मगर बहरा जगत बोले?
कराहा आह! मुझको राह का सुनसान खलता है,
अरे इन्सान! तुमको स्वयं ही इन्सान छलता है.

बहुत इन्सान मिलते हैं सड़क वीरान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?

न जाने क्यों हृदय कोमल सजाये प्यार बैठा है?
बहुत गुब्बार है मन में, नयन में ज्वार बैठा है!
कहाँ संसार सपनों का कहाँ वो तार कम्पित है?
कि आनत ग्रीष्म-पत्रों पर 'नया संसार' अंकित है.

जलन की वेदनाओं से बहुत पहिचान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?

रखे आशा कहाँ राही, निराशा के बवंडर में,
पनप कर ज्ञान के अंकुर, न फैले निठुर वंजर में!
बुझे जब दीप तो आँधी मनाने भी नहीं आयी,
जले जब दीप तो आँधी क्षितिज के छोर तक छायी.

दिशा के छोर में सिमटी मधुर मुस्कान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?

न जाने क्यों कभी अपने, पराये से नज़र आते,
न कोई आज तक बोला, कटा दो रात कुछ गाके.
बहुत धीरज समेटे हैं अभी तक बाँह फैली है,
कहाँ ठहरें ? यहाँ तो धूप से ही छाँह मैली है!

थकी है ज़िन्दगी, दम तोड़ती सी तान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?

प्रगति चीखी- 'तनिक ठहरो', तो आँधी ने कहा- 'बल है?'
मुसाफ़िर ने कहा- 'इतना अधिक इन्सान निर्बल है?'
सफ़र है ज़िन्दगी जो आँधियों में भी मचलती है,
अँधेरा जब बहुत बढ़ता, हृदय की ज्योति जलती है!

हृदय का दीप जलने दे- धरा नादान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?

मुसाफ़िर बढ़ रहा देखें- कहीं भगवान भी बोले,
न बोला आदमी तो राह की चट्टान भी बोले!
कहे पथ पर कोई आकर- 'बटोही ! पंथ प्यारा हो',
भले साँसें उखड़ जायें, बढ़ो का एक नारा हो.

यहाँ मंज़िल बताने को खड़ी चट्टान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है!

डगर सुनसान लगती है - बटोही तुम बढ़े जाओ,
सड़क वीरान लगती है - बढ़े जाओ न घबराओ!
जो चलता आग में जलता, उसे वरदान मिलता है,
कभी अनजान मंज़िल को नया मेहमान मिलता है!

हवा तूफ़ान की करती हुई आह्वान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है?

उठाले लाश ओ राही! किसी विश्वास के घर की,
बनाकर अर्थियां चल दे, यहाँ से आज पतझड़ की!
जिये विश्वास, पतझड़ की नया जीवन कहीं पाये,
बढ़ो तुम क्योंकि सम्भव है यहीं मंज़िल चली आये!

सजग यह चेतना गति की, लिये अभिमान लगती है,
न जानें क्यों मुसाफ़िर को डगर सुनसान लगती है!

- शिवदेव शर्मा 'पथिक'

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