परदेशी से

सौ-सौ सावन बीत गए पर, एक बार भी आ न सके तुम! 

धुला सजल नयनों का काजल
मैं विरहिन, मेरा मन चंचल
पलक खुले रह गए अचंचल

सौ-सौ दीप जलाए मैंने, छवि अपनी दिखला न सके तुम! 

प्राण सिहरते रहे तड़पकर
मेघ गरजते रहे रातभर
पाती लिखूँ लेखनी थर-थर

ओ परदेशी! अपनापन का नाता मधुर निभा न सके तुम! 

ओ मेरे निर्मम मनवासी
मैं पगली सावन की प्यासी
लिए जेठ की तपन, उदासी

कब से तुम्हें पुकार रही हूँ मलयज लहर उठा न सके तुम! 

निशा अमावस, पावस बरसे
विरहिन मूक, हूक ले तरसे
करवट-करवट अँखिया बरसे

पल-पल सपन मिलन का आये, मिलकर नयन मिला न सके तुम! 

पहर-पहर सुधि तुम्हें पुकारे
लहर-लहर पर कटे किनारे
थके आज दो नभ के तारे

डगर-डगर पर पलकें बिखरीं, चरण इधर को ला न सके तुम! 

पँख नहीं जो उड़कर आऊँ 
बंधे पाँव पग किधर बढ़ाऊँ 
अब मैं कितने दीप जलाऊँ

ओ परदेशी! कब आओगे पाती एक पठा न सके तुम! 

नारी-बंधी लाज की चेरी
पाँखों में पायल की बेड़ी
पुरुष अगम है छलना तेरी

चूड़ी की जंजीर, उलझने वाली लट सुलझा न सके तुम! 

किए प्रतीक्षा तेरी दुलहिन
बैठ गई है बनकर विरहिन
लम्बी रातें, लम्बें हैं दिन

कभी आरती की वेला में ओ प्रियतम मुसका न सके तुम!

- शिवदेव शर्मा 'पथिक'

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