प्रयाण गान

ओ नौजवान हिन्द के बढ़े चलो! बढ़े चलो! 
तू दीप रामराज के समाज को गढ़े चलो! 

स्वदेश के सपूत हो-विहान की कड़ी बनो, 
ओ नौनिहाल! देश के विकास की लड़ी बनो।
कि घिर रहा है अन्धकार हाथ में मशाल लो, 
जो जल रही दिशा-दिशा 
तो ज़िन्दगी को ढ़ाल लो! 

हहर रहा तूफान हो-कमान पर चढ़े चलो! 
ओ नौजवान हिन्द के बढ़े चलो! बढ़े चलो! 

तू भीष्म के सपूत हो-तू राम के समान हो, 
तू लाल आग क्रांति की-कृपाण के समान हो! 
ओ शांतिदूत! विश्व के विनाश का विरोध कर, 
है बस रहा नया नगर कि
पाँव बढ़ रहे जिधर! 

न जग रहा जहान हो-महान स्वर पढ़े चलो! 
ओ नौजवान हिन्द के बढ़े चलो-बढ़े चलो! 

दे आँधियाँ चुनौतियाँ
झुकी नहीं जवानियाँ, पहाड़ या पहाड़ियाँ रुकी नहीं रवानियाँ! 
न मिट सकी कहानियाँ शहीद की, महान की, 
आगे बढ़ रहे हैं पाँव, राह नौजवान की! 
तू ज़िन्दगी के गान से जमीन को मढ़े चलो! 
ओ नौजवान हिन्द के बढ़े चलो-बढ़े चलो! 

तनी हुई हैं छातियाँ चल रही है गोलियाँ, 
खेल कर मरे नहीं तू खून की भी होलियाँ, 
तू खून हो शहीद के-मस्तियों की टोलियाँ
नौजवान! हम तुम्हें लगा रहे हैं रोलियाँ! 

तो तुम नया प्रयाण-पथ गढ़े चलो! गढ़े चलो! 
ओ नौजवान हिन्द के बढ़े चलो-बढ़े चलो!

- शिवदेव शर्मा 'पथिक'

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