परिचय

मैं चुभाता शूल पथ पर जा रहा हूँ।

रोकने को राह मेरी, हर किसी ने शूल बोये,
तुम रहे दीपक बुझाते,मैं चला सपने सँजोये,
दग्ध हो उपहास से भी,मैं रहा बढ़ता डगर पर,
वेदनाओं को बहाये,नयन गंगा की लहर पर,

लड़खड़ाते हैं कदम, पर गा रहा हूँ।
मैं चुभाता शूल पथ पर जा रहा हूँ।।

लड़खड़ाती जिन्दगी का भार ढ़ोता,
बढ़ रहा मैं दीप लेकर साधना का,
विश्व! तेरे व्यंग्य हीँ संबल बनेंगे,
मंजिलों की ओर पल-पल पग बढ़ेंगे,
   
ठोकरें लगती मगर मुस्का रहा हूँ ।
मैं चुभाता शूल पथ पर जा रहा हूँ।।

जो उठे उसको गिराना चाहता जग,
गिर पड़े खिल्ली उड़ाना चाहता जग,
है मनुज का कर्म गिरते को उठाना,
किन्तु कैसा धर्म उठते को गिराना ?

धैर्य धरकर उलझनें सुलझा रहा हूँ।
मैं चुभाता शूल पथ पर जा रहा हूँ।।

- शिवदेव शर्मा 'पथिक'

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