जब-जब रात ढ़ला करती है

उर आकुल हो-हो जाता है,
जब-जब रात ढ़ला करती है।
क्रूर नियति की शोषणवाली,
लीला सदा खला करती है।

दूर पपीहरे का स्वर सुनकर,
फूट पड़े नयनों के निर्झर,
मलयानिल के झोंके आते,
दर्द भरी सुधियाँ सुलगाते,

कह उठता हूँ जाते-जाते,
पगली रात जला करती है।
उर आकुल हो-हो जाता है,
जब-जब रात ढ़ला करती है।

निशा ढ़ली तो दीप शिखा की,
लौ लगती धुँधली रेखा सी,
अलकों में उलझीं साँसो को,
ढ़ो-ढ़ो रात सदा ढ़ल जाती,

धीरे-धीरे चाँद गगन से,
ढ़लता आह कला भरती है।
उर आकुल हो-हो जाता है,
जब-जब रात ढ़ला करती है।

यहीं जवानी सुलग-सुलगकर,
खाक बनी रे ! हो-हो कातर,
यही मनुज की करूण कहानी,
ढ़ल जाती है यहीं जवानी,

मानव जीवन को नश्वरता
कब-कब नहीं छला करती है?
उर आकुल हो-हो जाता है,
जब-जब रात ढ़ला करती है।

रातें ढ़ल कर फिर आती हैं,
साँसें फिर से टकरातीं हैं,
रह-रह रात कटा लेता हूँ,
अपने गात सटा लेता हूँ,

क्या जीवन की रजनी लौटी,
मरकर साँस चला करती है?
उर आकुल हो-हो जाता है,
जब-जब रात ढ़ला करती है।

मानव के जीवन की रजनी,
ढ़ल जाया करती है सजनी!
जग जाती अन्तर में अक-धक,
बुझ जाते प्राणों के दीपक,

रातों को ढ़लते देखा है,
जब-जब चिता जला करती है।
उर आकुल हो-हो जाता है,
जब-जब रात ढ़ला करती है।

जीवन की रजनी ढ़लने पर,
मानव की अर्थी चलने पर;
क्या फिर से नव दीप जलेगा?
साँस चलेगी; प्राण पलेगा?

तिमिर मरण का करे हरण को,
जीवन-अमा भला टलती है?
उर आकुल हो-हो जाता है;
जब-जब रात ढ़ला करती है।

- शिवदेव शर्मा 'पथिक'

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