आ ना सके तुम पाती आई
सावन भर मैं बिरहिन बन-बन, मन में आस जगाती आई, आ ना सके तुम, पाती आई।
पाती पर निर्झरिणी झरती, दृग में आ बरसात उमड़ती, रह-रह कर में रो-रो पड़ती,
निर्मम हो तुम साजन मेरे! तुम क्या जाने 'पीड़ पराई' आ ना सके तुम, पाती आई।
मैंने ज्वार उठाए मन के दूर बसे साजन पूनम के स्वप्न देखकर मैं प्रियतम के,
मन के द्वार खोल रजनी भर, थक उकसाती बाती आई, आ न सके तुम पाती आई।
पाती में मैं प्राण न पाती, पाती को लेकर पी जाती, मैं लिखती हूँ उर की पाती,
मीरा के परदेसी तुम भी, किसकी आहट पड़ी सुनाई? आ ना सके तुम पाती आई।
आ ना सके तुम।
- शिवदेव शर्मा 'पथिक'
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