वाणी-वन्दना

प्यासे प्राणों की धरती पर तू तरस-बरस 
हे स्नेहमयी, हे किरणमयी, अनुरागमयी!
स्वर जगा कुहा की इस पथराई बेला में,
हे स्वर्णमयी, हे दयामयी! हे कलामयी!

वाणी! वीणा के तारों में भर दे कम्पन
दे मुक्ति ज्वाल, जो जला सके तम का बंधन
जीवन को संज्ञा मिले, चरण को संशोधन
चाहिए मनुज को ज्ञान, चेतना, उद्बोधन

आ! दे दे नश्वर धरती को तू अमर गान
दे निशा, दिशा, दे अमित सर्जना का विहान
मन के नंदन की जुही खिले सौ बार खिले
कामना प्रतीक्षित, अंजुलियों में दूब, धान

तू आ! बिखरी आशाओं को निर्माण मिले
तू गा! सूखे कंठों को मधुमय गान मिले 
तू बहा ज्ञान की गंगा रीते अंतर में
वर दे वाणी! युग को अक्षय दिनमान मिले

कण-कण को चूमे नवल चेतना का प्रभात
भूली-भटकी मानवता पाये रश्मि द्वार
जग उठे दृष्टि में निखिल सृष्टि का सम्मोहन 
वीणा-वाणी तुमको जन-जन का नमस्कार

- शिवदेव शर्मा 'पथिक'

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